निमाड़ी स्वांग मे आठ या दस पुरुष और एक स्त्री पात्र रहता है। स्त्री पात्र का अभिनय प्रायः पुरुष करते हैं। मोतियों की लड़ी और घुंघुरुओं से स्त्री पात्र का शृंगार किया जाता है। पुरुषों के हाथ में ढप रहता है, जिसे तोनक्या कहा जाता है। पुरुषों की टोली गीत छेड़ती है और उसके साथ ही स्त्री पात्र नृत्य में थिरक उठता है।
जोकर या हँसोड़ अभिनेता की भी इसमें रोचक भूमिका रहती है। निमाड़ी स्वांग में लावणी गाई जाती है या अन्य शृंगारपरक गीत। होली के अवसर पर स्वांग खूब चलता है। बुंदेली स्वांग राई लोक नृत्य से घनिष्ठ रूप में जुड़ा रहा है।
राई की प्रस्तुति में स्वांग के गीत गाये जाते हैं। राई के कलाकार स्वांग की प्रस्तुति भी करते हैं। विभिन्न अवसरों या त्योहारों पर विविध प्रकार के स्वांग प्रस्तुत किये जाते हैं। इस दृष्टि से बुंदेलखंड में प्रचलित स्वांगो का वर्गीकरण इस प्रकार किया जा सकता है. (1) होली का स्वांग (2) नवरात्रि का स्वांग (3) दिवारी (दीपावली) का स्वांग (4) अन्य त्योहारों के स्वांग (बहुरूपियों के स्वाग (5) स्त्रियों के स्वांग (6) बच्चों के स्वांग वर्तमान मे बुंदेलखंड में निम्नलिखित स्वांग प्रचलित हैं लोगटिया, लुनार दाउजू, धतूरा खान, मूरा, लुवाउनी, पंडत, ठाकुर, भूरी भैंस, विधवा विवाह आदि।
स्वांग के कलाकार गली, सड़क, चौराहे कहीं भी स्वांग का मंच सहज रूप में रच लेते हैं। बिना किसी सामग्री के अभिनेता लोकजीवन के दृश्य व साज सामान को मूर्त कर देते हैं। उदाहरण के लिये लोहटिया या सुनार दाऊजू नामक स्वांगों में भट्टी और धोकनी का दृश्य दिखाया जाता है।
इनमें किसी बालक को पेट के बल लिटा कर उसे धौंकनी बना दिया जाता है। उसके मुँह के सामने जलता हुआ कंडा रखा जाता है और धौंकने वाला धम्मन धाँकने की मुद्रा में उसके पाँव आगे पीछे करता है, लड़का कंडे में फूँक मारता है। इस तरह भट्टी और धौंकनी का दृश्य बन जाता है।
पाखंड और कुरीतियों पर व्यंग्य, विरूपीकरण, हास्य की छटाएँ व्यंग्य के बाण सभी स्वांगों में सामान्य विशेषताएं हैं।
राई नृत्य नाट्य:
राई नृत्य नाट्य बुंदेलखंड में प्रचलित है। इस के उस्तादों में इस समय रामसहाय पांडे अग्रगण्य हैं। इन्होंने राई को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर प्रतिष्ठित किया है। वंदना गीत की लटकनियाँ गाते हुए आलाप भरते हुए अपने साथी कलाकारों के साथ जैसे ही ये मंच पर उतरते हैं दर्शक मंत्रमुग्ध हो उठते हैं। इनके हाथ के मृदंग की बढ़ती थापों के साथ बेड़नियां घुमरे भरती हैं।
राई में मृदंग वादक और बेड़नियों की होड़ देखते ही बनती है। मृदंग बजाते हुए पलटनिया खाना इनकी कला की खासी करामात है। राई में साखी लगा कर गीत के मुखड़े जोड़ने के द्वारा राम सहाय पांडे ने उसे नई अर्थवत्ता दी है। इसमें कथा और प्रसंग के अनुसार गीत, दोहे, कुंडलिया, सर्वया, कवित्त आदि तत्काल जोड़ते जाते हैं। स्वांग की विधा से राई का चोली दामन का साथ है। राई और स्वांग जब जब होते हैं तो स्वांग में राई और राई में स्वांग समाये रहते हैं।
ढारा-ढारी का खेल-स्वांग का एक विशिष्ट रूप:
ढारा-ढारी का खेल राजस्थान और मालवा में प्रचलित रहे हैं। इनमें कृष्ण के चरित का अभिनय विशेष रूप से किया जाता है। इनके प्रयोक्ता ढारी जाति के लोग होते हैं। मालवा में ढोल बजाने वाले समाज के लिये ढोली संज्ञा प्रचलित है। ढारी उसीसे मिलती जुलती जाति है, पर ढोल के स्थान पर ये सारंगी या रबाब बजाते हैं। ढारी एक घुमंतू समाज है।
जन्माष्टमी आदि पर्वों के अवसर पर ढारा-ढारी का स्वांग रचा जाता है, जिसमें एक पुरुष ढारा और दूसरा ढारिन बनता है। दोनों आराध्य श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने नृत्य करते हैं। ढारी समाज में हिंदू और मुसलमान दोनों होते हैं और दोनों यह नृत्य नाट्य करते आ रहे हैं।
मध्यप्रदेश में उज्जैन के अनेक मोहल्लों में कुछ वर्ष पूर्व तक ढारा-ढारी के खेल खूब प्रचलित थे। बाद में माच के गुरुओं ने ढारा ढारी की कला के समावेश के साथ माच का विकास किया। तुर्रा कलंगी तुर्रा कलंगी मध्यप्रदेश के मालवा तथा अन्य अंचलों में प्रचलित अपने ढंग का अनोखा लोकनाट्य रहा है।
इसमें तुर्रा और कलंगी ये दो दल आपस में पद्यबद्ध संवाद और सवाल जवाब से अभिनय प्रस्तुत करते हैं। इनमें तुर्रा शिव का और कलंगी शक्ति का प्रतीक है। ये पद्य प्रायः आध्यात्मिक होते हैं। इंदौर, उज्जैन, शाजापुर आदि के गाँवों में तुर्रा कलंगी के अनेक दल सक्रिय रहे हैं। माच के अनेक गुरुओं ने कलंगियों की रचना की है।