सेल्फ असेसमेंट, खुद का मूल्यांकन आत्मविश्लेषण बहुत जरूरी है| हर व्यक्ति को अपने जीवन में किसी ना किसी मोड़ पर सिंहावलोकन करना चाहिए|
हम किस पोजीशन पर हैं? हम कहां खड़े हैं? हम क्या कर रहे हैं, हम क्यों कर रहे हैं? यह सब जानना बहुत जरूरी है| “खुद” से कुछ सवाल करना बहुत जरूरी है| अपने आपको ही जज बना लीजिए| अपने सामने अपनी सारी पोल खोल दीजिए|
सब कुछ सामने ले आइए और बताइए कि मैं ऐसा हूं| यह कर रहा हूं| मुझे ऐसा करना चाहिए या नहीं करना चाहिए?
जीवन के किसी भी मोड़ पर आप बदल सकते हैं..
यदि आप अपनी लाइफ में सही स्थान पर नहीं हैं, आप सही रास्ते पर नहीं हैं, आपने बहुत सारी भूल कर दी है, आपने बहुत सारे पाप कर दिए है, इसके बावजूद हर “क्षण” आपको बदलने की परमिशन देता है|
परमात्मा के सामने यदि आप अपनी भूलों को स्वीकार कर लेते हैं, गलतियों को मान लेते हैं, पाप का प्रायश्चित करने का फैसला लेते हैं, तो परमात्मा आपको माफ कर देता है, परमात्मा सर्वशक्तिमान है| वह आपके पापों की सजा कम भी कर सकता है, और उसे पूरी तरह माफ भी कर सकता है|
एक व्यक्ति यह सोचता है कि वह बहुत अच्छे रास्ते पर है, धर्म-कर्म कर रहा है, पुण्य कर रहा है, ईश्वर की भक्ति कर रहा है, मंदिरों में दान कर रहा है, लेकिन क्या वास्तव में वह सही रास्ते पर है?
यदि वह अपनी अंतरात्मा में झांकता है, अपने आप से कुछ सवाल पूछता है, तो उसे पता चलेगा कि जो वह कर रहा है बस वह दिखावा मात्र है| हम अपने आप से अपने आप को नहीं छुपा सकते| हम परमात्मा से नहीं छिप सकते|
समाज,देश, दुनिया के सामने हम कैसा ही प्रस्तुत हो जाएं| लेकिन खुद को धोखा नहीं दिया जा सकता| कब तक हम धोखा देते रहेंगे| समय बहुत तेजी से निकलता है| लाइफ बहुत मुश्किल से मिलती है|
आप गेम चेंजर बन सकते हैं हारते-हारते भी जीत सकते हैं| गर्त में जाते हुए भी पलटकर और शिखर पर पहुंचने का फैसला कर सकते हैं| यहाँ गेम चेंजर बनने का अर्थ सिर्फ भौतिक सफलता से नहीं है|
भौतिकता की अंधेरी दुनिया में गुम होते हुए भी आप अध्यात्म के रास्ते पर चल सकते हैं| सच्चाई और भलाई के रास्ते पर चल सकते हैं| बदलाव के रास्ते पर चल सकते हैं| देर कभी नहीं होती|
समय-समय पर हम अपने आप को जांचते रहें..
ईश्वर की कृपा से अच्छी बातें हमें पता चलती हैं लेकिन हम मूल्यांकन नहीं करना चाहते| अपने आप को परखना नहीं चाहते| अपने आपको बदलना नहीं चाहते| इसीलिए हम वहीं के वहीं रह जाते हैं| अपने आपको कभी भी पूर्ण मत मानिए| पूर्णता की यात्रा हमेशा चलती रहेगी| कोई भी यहाँ पूर्ण नहीं|
खुदको पूर्ण मानने गलती ना करें| अपने आपको गलतफहमी में न रखें| गलतफहमी बहुत नीचे ले जाती है| कम से कम हमें यह पता तो रहे कि हम कहां गलत है| हमें पता तो रहे कि हम कहां जा रहे हैं| एहसास, जिम्मेदारी का बोध होना, अपनी गलतियों के बारे में पता होना, उन्हें स्वीकार करना यही तो पहला कदम है|
सच्चाई के साथ कन्फेशन के साथ मैदान में उतरे|