जीवन धारणाओं का एक समुच्चय है| अनेक प्रकार के व्यक्ति इस दुनिया में होते हैं, उन सब की सोच-समझ, देश-काल परिस्थिति के अनुसार धारणा निर्मित होती है| साइंस वही धारणा निर्मित करता है जिसे वो प्रूफ कर देता है| साइंस की अपनी धारणाएं हैं लेकिन यह जरूरी नहीं कि साइंस ने जो प्रूफ नहीं किया है वह सत्य नहीं है|

 

कंट्राडिक्शन कुछ भी नहीं है सिर्फ वह हमारे सोचने के तरीके और कांटेस्ट का खेल है| हम किस कांटेस्ट में बात कर रहे हैं उसी पर डिपेंड करता है कि हम कि जो सोच रहे हैं वह सच है या गलत|

 

कई महात्मा संत और ज्ञानियों ने हमसे कहा कि जीवन एक खेल है| कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि यूनिवर्स वीडियो गेम की तरह है| ग्रंथों में भी यही कहा गया कि ब्रह्म, सत्यम, जगत, मिथ्या|

 

क्या यह यूनिवर्स एक प्रोग्रामिंग है? और उसी प्रोग्रामिंग के आधार पर हम सब काम कर रहे हैं? क्योंकि हमारी लाइफ टाइप्ड है, हम अपने प्रारब्ध के वशीभूत हैं| जो हमारा प्रारब्ध है उसी के अनुसार हमारा वर्तमान है|

 

यह कंप्यूटर प्रोग्रामिंग कैसे काम करती है जो पूरी यूनिवर्स को चलाती है| इस प्रोग्रामिंग को समझकर कैसे हम अपनी लाइफ को बेहतर कर सकते हैं? सभी चीजों को मेनिफेस्ट कर सकते हैं जो हम चाहते हैं| जो हमारी धारणा है उसी के अनुसार हमारी चाहत होती है|

 

किसी को सत्य की तलाश है| किसी को भौतिक पदार्थों की तलाश है| किसी को यश की तलाश है| किसी को दबदबा कायम करना है| किसी को नेता बनना है| किसी को अभिनेता बनना है |

 

मानव अपने भविष्य को बना सकता है, उसका निर्धारण कर सकता है बस उसे यूनिवर्स को एक्सप्लोर करने की जरूरत है| यूनिवर्स खुद मदद करने नहीं आता, हमें यूनिवर्स से मदद लेने का तरीका सीखना होता है| फॉर्मूले तलाशने होते हैं| जैसे ही हम फॉर्मूला तलाशते हैं यूनिवर्स से हम वह सारी चीजें मेनिफेस्ट करने लगते हैं, जिन चीजों की हमें जरूरत होती है|

 

यूनिवर्स के काम करने का तरीका मानव ने धीरे-धीरे सीखा है इसी वजह से उसने भौतिक स्तर पर तरक्की के नए कीर्तिमान गढ़ दिए हैं| जैसे-जैसे जीव अपनी चेतना का विकास करता जाता है वैसे-वैसे उसे इस यूनिवर्स से अपनी मनचाही चीजें हासिल करने के फार्मूले मिलते चले जाते हैं| वो यूनिवर्स की कोडिंग को जैसे-जैसे डीकोड करते जाता है अपनी सुविधाओं का विस्तार करते चले जाता है|

 

आपको जीवन में चाहिए क्या सबसे पहले तो आपको इसका निर्धारण करना पड़ेगा? हमारी प्राथमिकता क्या है और जो हमारी प्राथमिकता है उसी पर हम ध्यान केंद्रित कर देते हैं| मन की सारी शक्तियों को उस प्राथमिकता पर लगा देते हैं| धीरे-धीरे हमें पता चलता है कि यूनिवर्स हमें अपनी प्राथमिकता की तरफ आगे ले जा रहा है|

 

यह एक सर्वमान्य फॉर्मूला है| इसी के आधार पर वैज्ञानिक विभिन्न प्रकार के शोध कर पाने में सक्षम हुए हैं| जैसे प्रकृति आकार लेने लगती है वैसे ही मनुष्य आकार लेने लगता है| मनुष्य धीरे-धीरे अपनी चेतना के अनुसार विकसित होने लगता है|

 

जब लोक-लोकांतर है, अनेक विश्व हैं, अनेक यूनिवर्स हैं, अनेक ऐसे ग्रह नक्षत्र है जहां पर जीवन मौजूद है| कई बार वहां के उन्नत प्राणी जिनको हम देवता कहते हैं वह भी हमारी सहायता करते हैं|