ज्यादातर लोगों को कहते सुना है और पढ़ा भी है कि अपमान सहन नहीं करना चाहिए। लेकिन यह बात उन लोगों के लिए नहीं है, जो जन कल्याण के लिए किसी बड़े मकसद को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। महापुरुष जिनकी अपमान ने बदल दी जिंदगी 1-महात्मा गाँधी को दक्षिण अफ्रीका में प्रथम श्रेणी का टिकट होने के बावजूद ट्रेन से नीचे अपमानपूर्वक उतार दिया गया। उन्होंने वह अपमान सहन कर लिया। इसी अपमान ने उन्हें आत्मशक्ति जाग्रति की ओर प्रेरित किया। आगे चलकर उन्होंने इस आत्मशक्ति के बल पर भारत में जन-जन को जाग्रत और आंदोलित कर भारत से उस साम्राज्य को उखाड़ फैंका जिसमें कभी सूर्यास्त नहीं होता था।

 2-कबीर के बारे में कहते हैं कि जब उनका यश वाराणसी में फैलने लगा, तो वह एक वैश्या का हाथ थामकर सरे बाज़ार गुजरे, ताकि लोग उनकी निंदा करें। शास्त्रों में उदाहरण भरे पड़े हैं कि जिन लोगों ने भी आत्मज्ञान की ओर कदम बढ़ाया, उनका बहुत अपमान किया गया। ऐसा लगता है कि सच्चे साधकों के लिए यह ईश्वरीय व्यवस्था है कि साधक को अहंकार ग्रस्त होने से बचाने के लिए उसका समय-समय पर अपमान कराते रहो। समझदार साधक स्वयं भी जानबूझकर कभी-कभी ऐसे काम करते रहते हैं, या अनजाने में उनसे ऐसे काम होते रहते हैं कि लोग उन्हें लानत भेजते रहें, मूर्ख या पाखंडी कहें और उन्हें तरह-तरह से बदनाम करें। 

3-संत तुलसीदास का क्या कम विरोध हुआ? उन्हीं की जाति-समाज के लोगों ने उनको यह कहकर खूब अपमानित किया कि वे गँवारू भाषा में रामचरित मानस लिख रहे हैं। तुलसीदास कीं रचना में इसकी अभिव्यक्ति भी हुयी है। लेकिन वे अपमान को सहते हुए आगे बढ़ते गये और वो मुकाम हासिल किया जो उनके बाद कोई हासिल नहीं कर पाया। 4- स्वामी विवेकानंद ने अपमान के कम घूंट नहीं पिये। उनके विषय में तो भारतीय लोगों ने ही इतनी घृणास्पद बातें की कि सिर शर्म से झुक जाता है। लेकिन स्वामीजी अविचलित रहकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे। इतिहास देखने पर स्पष्ट होता है कि ऐसा कोई महापुरुष नहीं हुआ, जिसे अपमानित नहीं होना पड़ा हो।

 5-भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपमान के कितने कडवे घूँट पिए, लेकिन उन्होंने इस अपमान को अपनी ताकत बनाया और आज आधुनिक भारत के महानतम लोगों में उनकी गिनती होती है. इस सोच के पीछे सबक यह है कि रिएक्ट मत करो और आवेर रिएक्ट तो करो ही मत। रिएक्ट किया कि मकसद से गिरे। यही तो संसार चाहता है। समाज जैसा आज है, वैसा ही सदा से है। वह इस बात को कभी सहन नहीं कर पाता कि कोई उससे श्रेष्ठ बनने की कोशिश करे -तेरी क़मीज हमारी क़मीज से साफ क्यों? समाज में आम आदमी खाने, पीने, सोने, पैसा कमाने, नाम कमाने के लिए कई-कई कोशिशें करने और इसी तरह की तुच्छ बातों को सबसे ज्यादा महत्व देकर उसी में सारा जीवन गुजार देता है। 

इसके आगे, किसी ऊँची भाव-भूमि पर जाने की कल्पना तक उसके मन में नहीं आती। ऐसे में कोई व्यक्ति अगर कुछ अलग राह चलने लगे या कुछ अलग आचरण करने लगे, तो वे उसे समझ नहीं पाते। पहले तो वे उसे समझा-बुझाकर अपनी ही राह पर लाने की कोशिश करते हैं। और कई लोग उनकी बातों में आकर उनकी तरह हो भी जाते हैं। लेकिन कोई दृढ़ संकल्प का धनी अपने मार्ग पर अडिग रहता है, तो वे उसके बारे में अनर्गल बातें कर उसे बदनाम और मौका मिलते ही अपमानित करते रहते हैं। इसीलिए उन लोगों को अपमान सहना सीखना चाहिए, जो लोग जीवन में कुछ बड़ा हासिल करना चाहते हैं उन्हें अपमान को सहन कर उसे अपनी ताकत बनाने कि तरफ बढ़ना चाहिए. यह अपमान जहर नहीं अमृत है. ..........