कांग्रेस राज्यसभा सीट चोरी का आरोप लगा रही है. इस चोरी में रिटर्निंग ऑफिसर, चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को भी शामिल बता रही है. सुप्रीम कोर्ट पर राज्यसभा सीट चोरी में शामिल होने का आरोप किसी सामान्य नेता का नहीं बल्कि कांग्रेस के ऐसे नेता का है जो मध्यप्रदेश में 10 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहे हैं. लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा के सदस्य रहे हैं.

    सीट चोरी की बात तो राहुल गांधी भी कर रहे हैं अब तो सुप्रीम कोर्ट ने मीनाक्षी नटराजन की याचिका खारिज कर दी है. सुप्रीम कोर्ट ने भी रिटर्निंग ऑफिसर के निर्णय को सही माना है. चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि प्रक्रिया के मुताबिक रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले पर आयोग हस्त्शेप  नहीं कर सकता. कांग्रेस इसके विपरीत लगातार कह रही है कि चुनाव आयोग वोट चोरी और सीट चोरी में शामिल है. उसके पास रिटर्निंग ऑफिसर का निर्णय बदलने का अधिकार है लेकिन वह जान बूझकर लोकतंत्र की हत्या कर रहा है. 

    कांग्रेस के मुताबिक देश में सब कुछ खत्म हो गया है, चुनाव आयोग सरकार के इशारे पर चोरी कर रहा है. सुप्रीम कोर्ट भी उसमें शामिल है. देश की अदालतों पर सबको भरोसा है. कांग्रेस अगर भरोसा नहीं करती तो उसे अदालत में जाने का प्रयास भी नहीं करना चाहिए, जब कोर्ट का फैसला पक्ष में आएगा तब अदालत निष्पक्ष और जब फैसला खिलाफ होगा तोनीयत पर सवाल किए जाएंगे. मानहानि केस में सजा के बाद राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता कानूनी प्रक्रिया से समाप्त की गई थी तब उन्हें राहत सुप्रीम कोर्ट से ही मिली थी.

    अदालतों में तमाम खामियां हो सकती हैं लेकिन अभी भी सबसे विश्वसनीय संस्था वो ही है. कोई भी सिस्टम रूल आफ लॉ स्थापित करने के लिए होता है. लोकतांत्रिक प्रक्रिया में राजनीतिक दलों की भूमिका भी रुल ऑफ़ लॉ के अंतर्गत ही होनी चाहिए.

    सत्ता की आकांक्षा में कांग्रेस अराजकता को प्रोत्साहित करते हुए दिखाई पड़ रही है जब उसे किसी भी संस्था पर भरोसा नहीं है, सरकार की आलोचना को तो राजनीतिक प्रक्रिया माना जा सकता है लेकिन अदालत और संवैधानिक संस्थाओं पर मिलीभगत से चोरी जैसे आरोप व्यवस्था के विरोध में एक सोच समझा  कदम ही कहा जाएगा. 

    सिस्टम से नाराजगी सामान्य प्रक्रिया है लेकिन सिस्टम पर अविश्वास करते हुए उसके खिलाफ विद्रोह को प्रोत्साहित करना आपराधिक है. लोकतांत्रिक प्रक्रिया में कांग्रेस को बार-बार हराकर जनता तो कांग्रेस के इस अराजक नरेटिव को लगातार पराजित कर रही है लेकिन फिर भी संविधान की संस्थाओं की गरिमा को जिस ढंग से चोट पहुंचाई जा रही है उस पर अब वैधानिक कदम उठाने का वक्त आ गया है.

    कांग्रेस नेताओं में यह साहस राहुल गांधी की सोच से शायद आता है, सर्वाधिक मानहानि के मुकदमे झेलने वाले राहुल गांधी देश के अकेले नेता हैं. वे तो मानहानि के अभ्यस्त हैं. अब दूसरे नेता भी कोर्ट को चोरी का आरोपी बता रहे हैं. राहुल गांधी ने जब चौकीदार चोर है का अभियान चलाया था तब अपने राजनीतिक अभियान में उन्होंने यह बयान दिया था कि अब तो सुप्रीम कोर्ट भी मान रहा है कि चौकीदार चोर है. उनके इस बयान को सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं संज्ञान लेकर उन्हें माफी माफी मांगने के लिए मजबूर किया था.

    लोकतंत्र और संविधान की रक्षा का दायित्व सुप्रीम कोर्ट पर ही है. उसकी मर्यादा और गरिमा को कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी की ओर से खंडित करने का प्रयास किया जाता है तो  इसे साधारण राजनीतिक प्रक्रिया मानकर छोड़ा नहीं जा सकता है. नक्सली सोच भी यही है.  राजनीतिक विरोध समझा जा सकता है किसी निर्णय का विरोध भी जायज है लेकिन रूल-ऑफ़ लॉ के अंतर्गत जिसको अंतिम निर्णय करना है उस पर अविश्वास को दिखाना पूरी व्यवस्था को कमजोर करने जैसा है.

    नामांकन और चुनाव रद्द होना कोई नया नहीं है. मीनाक्षी नटराजन के केस में 12 जून को फैसला आया है. यह एतिहासिक तिथि है. इलाहाबाद हाईकोर्ट में 12 जून 1975 को ही तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी का चुनाव अनैतिक आचरण के आरोप में रद्द कर दिया था. अदालत के फैसले के राजनीतिक प्रभाव को रोकने के लिए देश में तभी इमरजेंसी लगाई गई थी, इंदिरा गांधी को बाद में राहत भी कोर्ट से ही मिली थी. अब जब कांग्रेस कोर्ट को ही सीट चोरी में शामिल होने के लिए जिम्मेदार मान रही है तो फिर यह भी सोचना पड़ेगा कि कांग्रेस सत्ता की भूख में पूरी व्यवस्था को अराजक और विद्रोही बनाना चाहती है.

    प्रतिभाओं का दमन कांग्रेस के पतन का बड़ा कारण है. कांग्रेस इमरजेंसी मीटिंग कर देश में जन आन्दोलन खड़ा करने की बात कर रही है. जिन चेहरों के साथ वह आंदोलन चलाना चाहती है उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध है. कांग्रेस को अपने क्रेडिट स्कोर की सबसे पहले जांच करना चाहिए. मीनाक्षी नटराजन के मामले में ही जिस तरह का स्टैंड कांग्रेस ने लिया है वह एक तरफ अनावश्यक राजनीतिक रिएक्शन दिखता है तो दूसरी तरफ अदालत और संवैधानिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करता है.

    कांग्रेस को कोई नहीं हरा रहा है, जो खुद से हार रहा है उसको हारने के लिए दूसरे की आवश्यकता नहीं है. कांग्रेस रहे ना रहे संविधान रहेगा, कोर्ट रहेगा, चुनाव आयोग रहेगा, यह व्यवस्था भी रहेगी. भारत रूल ऑफ़ लॉ से ही चलेगा. 

    कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट पर सवाल खड़े कर रूल ऑफ ला के इंतकाल का ऐलान जरूर कर रही है. देश को जिस पर विश्वास है उस पर कांग्रेस का अविश्वास पार्टी के घटते क्रेडिट स्कोर का कारण है.