ललित मोदी ने अचानक से सुष्मिता सेन के साथ फोटो शेयर करके सनसनी मचा दी। निश्चित रूप से मिस यूनिवर्स के किसी के साथ रिश्ते में होने से फैन्स का दिल टूट गया, इसके बाद सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ सी आ गई। सोशल मीडिया पर उसे "सुष्मिता को सोने की खदान में सेंध लगाने वाला" बताया गया, जिसने कई सवाल खड़े कर दिए।

इस बात की घोषणा खुद ललित मोदी ने की, जिन्होंने अपने रिश्ते को उजागर करने के लिए अपने इंस्टाग्राम हैंडल का सहारा लिया। तस्वीरें अपलोड होने के केवल आधे घंटे के भीतर, यूजर्स ने इस बात की आलोचना की और इस पूरी स्थिति का मज़ाक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मोदी के एक दशक पुराने ट्वीट से लेकर सुष्मिता सेन की तस्वीरों तक, सोशल मीडिया पर कई तरह की अफवाहों की बाढ़ आ गई, कि सुष्मिता सेन ललित मोदी को उनके पैसे के लिए ही डेट कर रही हैं।

ललित मोदी भारतीय मीडिया के लिए एक जाना-पहचाना नाम हैं। वे इंडियन प्रीमियर लीग के संस्थापक एक अमीर बिजनेस टाइकून हैं, जिनकी कुल संपत्ति लाखों में है। दूसरी ओर, सुष्मिता सेन भी मीडिया की पसंद रही हैं, जो 1994 में मिस यूनिवर्स का खिताब जीतने के कारण सुर्खियों में रही थीं। सुष्मिता एक आत्मनिर्भर और स्वावलंबी महिला हैं उनका कहना है, "मैं अपने हीरे खुद खरीदती हूं, मुझे उसके लिए किसी पुरुष की आवश्यकता नहीं है," काफी समय पहले लिए गए इंटरव्यू का अंश।

सुष्मिता ने अपने करियर में कई पुरस्कार जीते हैं, उन्हें अपने जीवन यापन के लिए किसी पुरुष की आवश्यकता नहीं। फिर ऐसा क्यों है कि आज वह अश्लील सेक्सिएस्ट चुटकुलों और मीम्स का शिकार हो रही है?

दो बच्चों की एक बेहद सफल मां अपनी निजी पसंद के लिए लोगों की आलोचनाओं का शिकार बनने से लेकर एक सॉफ्ट टारगेट साबित हुई हैं। ये तो आम हो गया है, किसी महिला को बस इसलिए नीचा दिखाया जाता है, क्योंकि वो किसी ऐसे पुरुष को डेट कर रही है जो उससे पैसे में थोड़ा ज़्यादा है, यह पुरुषवादी मानसिकता पर आधारित है।

किसी महिला के अपनी मर्जी से अपना पार्टनर चुनने से हमेशा ही उसको बायस्ड लोगों की आलोचना का सामना करना पड़ता है, इसमें इंटरनेट की एक बड़ी भूमिका निभाता है।

यहां तक कि जब तक एक पुरुष पारंपरिक रूप से महिला का संभावित पति बनने के समाज के बनाए हुए अपने ही खाके में फिट नही बैठता तो उसका चुना जाना गलत ही समझा जाता है। ये बात बड़ी ही अजीब है जब की पुरुष अपना पार्टनर चुनता है, तो उसे इस तरह की बायस्डनेस का शिकार नहीं होना पड़ता, समाज पुरुषों के लिए समान मानकों का निर्धारण क्यों नहीं करता।

एक महिला से ही क्यों हमेशा इस बात की उम्मीद की जाती है। "सोने की खदान में सेंध लगाने" अवधारणा पूरी तरह से रूढ़िवादी सामाजिक मान्यताओं पर आधारित है, जो पूरी तरह से निराधार और सामाजिक कुरीतियों को ही बढ़ावा देती है।
किसी को भी इस बात का हक नहीं कि किसी की पर्सनल लाइफ में कोई दखल दे। सबको अपनी-अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने का पूर हक है।