भोपाल: सूचना का अधिकार अधिनियम आने के 17 वर्षं उपरांत भी व्याप्त गोपनीयता की कार्यसंस्कृति के कारण अधिकारियों की सोच में परिवर्तन की रफ़्तार धीमी है। शासन में जन-जन की भागीदारी सफल लोकतंत्र का मूलमंत्र है किंतु ये सब क़िताबी बातें ही हैं।

भ्रष्टाचार एवं पारदर्शिता पर काम करने वाली संस्था ‘‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया” की ओर से जारीछठा वार्षिक रिपोर्ट- स्टेट ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट के अनुसार कानून के तहत सूचना का अधिकार मिलने के 17 वर्षों (2005-2022 ) में उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर देश के 4 .2 करोड़ से अधिक ने इस अधिकार का इस्तेमाल किया है।

26 लाख से अधिक द्वितीय अपील एवं शिकायत सुचना आयोग में भेजी गयी। टीआईआई हर वर्ष आरटीआई एक्ट से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण अधिनियम मसलन 25(2), सेक्शन 19(1), सेक्शन 19(2), सेक्शन 20(1), रिक्त पद, बजट, वार्षिक रिपोर्ट एवं वेबसाइट पर फोकस कर रिपोर्ट पेश की है।

सूचना का अधिकार दिवस फेक्ट फ़ाइल-

•  2005 से अब तक कुल 4.2 करोड़ लोगों ने सूचना के अधिकार का इस्तेमाल किया, देश के सूचना आयोगों के समक्ष अब तक करीब 26 लाख द्वितीय अपील एवं शिकायत दर्ज।
•  देशभर में संघ एवं राज्य सूचना आयोग में, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल में दिए गये निर्देश के बावजूद कुल 165 पद में 2 मुख्य सूचना आयुक्त सहित 42  पद खाली।
•  राज्यवार सूचना के अधिकार के प्रयोग में केंद्र सरकार के बाद, महाराष्ट्र सर्वोच्च स्थान पर, तमिलनाडु एवं केरल को दूसरा, तीसरे स्थान।
•  अधिकांश राज्य सूचना आयोग ने अपनी कई वर्ष से वार्षिक रिपोर्ट तक नहीं प्रकाशित की, केवल 10 राज्य ने वर्ष 2020 की वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित की, वार्षिक रिपोर्ट के मामलों में छत्तीसगढ़, गुजरात , राजस्थान अरुणाचल प्रदेश एवं मिजोरम सबसे  बेहतर।
•  केंद्र एवं 10  राज्यों  में ऑनलाइन आर टी आई अपील/आवेदन  फाइलिंग पोर्टल चालू, इन में से आधे ही काम कर रहे है।

26 लाख द्वितीय अपील के मामले लंबित, सूचना आयोगों में द्वितीय अपील एवं शिकायत

सूचना के अधिकार अधिनियम धारा 19(3) एवं धारा 18 के तहत-कुल द्वितीय अपील एवं शिकायतों की संख्या करीब 26. 25 लाख दर्ज़ हुई. द्वितीय अपील एवं शिकायतों की कुल संख्या के आधार पर तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केन्द्रीय सूचना आयोग के सबसे अधिक हैं।

सूचना देने में टाल-मटोल करते हैं अफसर-

ट्रांसपेरेंसी  इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक रमा नाथ झा ने कहा कि कानून लागू होने के 17 साल बाद भी देश में शक्तिशाली कुर्सियों पर बैठे लोगों की मानसिकता नहीं बदली हैं, वो सूचना देने की जगह टालमटोल करने में यकीन रखते हैं।

आंकडों से पता चलता है कि 60 प्रतिशत से ज्यादा आरटीआई अर्जियां गांवों से लगाई जाती हैं न कि आरटीआई कार्यकर्ताओं द्वारा। झा ने कहा “सूचना आयोग में रिक्तियां देश भर में संघ एवं राज्य सूचना आयोग में, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल में दिए गये निर्देश के बावजूद कुल 165 पद में 2 मुख्य सूचना आयुक्त सहित 42 पद (पिछले वर्ष केवल 36 पद) अभी भी रिक्त हैं।”

कमजोर हो गई कानून की धार-

"17 वर्ष में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण आरटीआई की शक्ति कम हो गयी, केंद्रीय और राज्य सूचना आयोगों की खराब हालत; लोक कल्याण एवं महत्वपूर्ण मामलों में सूचना अनुरोधों को बिना वज़ह खारिज कर दिया जाता है, सूचना आयोग में सुनवाई के कम से कम 2 साल समय, और आरटीआई कार्यकर्ताओं और व्हिसलब्लोवर के खिलाफ उनकी आवाज दबाने के लिए हमलों और धमकियों के वज़ह से इस क़ानून की धार कमजोर हो गयी।" अजय दुबे- टी आई आई के बोर्ड के सदस्य