भोपाल: जंगल महकमे में शीर्षस्थ अफसरों के चाहतों को छोड़कर जूनियर अफसर से वर्किंग प्लान बनाने संबंधित शासन के आदेश को लेकर अब प्रभावित अफसर हाई कोर्ट की डबल बेंच में जाने का मन बना रहे हैं. केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण जबलपुर (कैट) के आदेश पर सुनवाई करते हुए राज्य शासन ने शुक्रवार को जारी किया. आदेश के तहत कटनी डीएफओ रमेश चंद्र विश्वकर्मा आवेदन को अमान्य करते पूर्व आदेश को यथावत रखा. वर्तमान आदेश की तकनीकी खामियों के चलते विश्वकर्मा ने अब हाई कोर्ट डबल बेंच में जाने का मन बना लिया है.

 

वन विभाग के नौकरशाहों ने कैट के आदेश के बाद कटनी डीएफओ रमेश चंद विश्वकर्मा के अभ्यावेदन पर सुनवाई कर  उनके आग्रह को ठुकरा दिया. इस संदर्भ में शासन की ओर से तर्क दिया गया कि 5 जून 2020 को जारी आदेश के तहत कारी योजना इकाई में आईएफएस अफसरों की पदस्थापना के संबंध में पूर्व में निर्धारित नीतियों को निरस्त किया गया है. इस आदेश में सीसीएफ, सीएफ और डीसीएफ स्तर के अधिकारियों से वर्किंग प्लान बनवाने का उल्लेख है.

अतः आयु अथवा वरिष्ठता के आधार पर पदस्थ करने का प्रश्न उपस्थित नहीं होता. शासन ने यह भी तर्क दिया है कि 5 जून 2020 द्वारा स्पष्ट निर्देश जारी किए गए हैं, जिसमें शासन प्रशासकीय आधार पर सीसीएफ, सीएफ और डीसीएफ स्तर के अधिकारी को कार योजना इकाई में पदस्थ करता है. वरिष्ठता अथवा आयु सीमा के आधार पर पदस्थ करने संबंधी कोई प्रावधान नहीं है. सुविधा की दृष्टि से नियोक्ता द्वारा योग्य अधिकारियों की पदस्थापना प्रशासकीय आधार पर की जाती है.

इन आधारों आधारों पर हाई कोर्ट डबल बेंच में देंगे चुनौती-

वर्किंग प्लान बनाने संबंधित आदेश से प्रभावित डीएफओ रमेश चंद्र विश्वकर्मा हाईकोर्ट डबल बेंच में चुनौती देंगे. उनका कहना है कि शासन के आदेश में कई खामियां हैं. मसलन, वन विभाग में  वर्ष 2001 की पॉलिसी को 2005 में निरस्त किया गया. वर्ष 2005 की पॉलिसी में वरीयता क्रम से वर्किंग प्लान बनवाने का प्रावधान किया गया था. इस नीति में आयु से संबंधित कोई छूट नहीं दी गई थी. 2017 में आईएफएस अफसरों के एक झुंड ने तत्कालीन वन मंत्री डॉ गौरीशंकर शेजवार पर दबाव बनाकर 2005 की पॉलिसी में संशोधन कराया.

इस संशोधन में आयु से संबंधित छूट दी गई. वर्ष 2017 में किए गए संशोधन को निरस्त करते हुए 2020 में वर्किंग प्लान बनाने संबंधित नए आदेश जारी किए. इस आदेश में आयु की छूट नहीं दी गई. प्रभावित अफसर का कहना है कि शासन ने 2017 में हुए संशोधन को निरस्त किया है. जबकि शासन को 2005 में बनी पॉलिसी को निरस्त करते हुए 2020 के वर्किंग प्लान को प्रभाव शील बनाया जाना था. उनका दावा है कि 2005 की पॉलिसी अभी भी प्रभाव शील है क्योंकि वह निरस्त नहीं की गई है.

वर्किंग प्लान से कतराते क्यों है अफसर-

90 के दशक तक वर्किंग प्लान बनाने से आईएफएस अफसर कतराते नहीं थे. जैसे-जैसे वन मंडलों में बजट करोड़ों में कैंपा लघु वनोपज संघ और डेवलपमेंट शाखा से आने लगे, वैसे-वैसे अफसर वर्किंग प्लान से बचने के लिए रसूखदार और  अभिजात वर्ग के आईपीएस अधिकारी सारे जतन करने लगे हैं. एक अधिकारी के मुताबिक सिंगरौली सतना छत्तरपुर, टीकमगढ़, श्योपुर कला, दक्षिण सागर, उत्तर सागर, छिंदवाड़ा पूर्व एवं पश्चिम, खंडवा हरदा होशंगाबाद सीहोर सहित दो दर्जन से अधिक वन मंडलों का बजट 20 से 30 करोड़ के आसपास है.

वेतन को छोड़कर इन वन मंडलों के डीएफओ की सालाना इनकम 80 लाख से एक करोड़ रूपया होती है. इसके अलावा नौकर चाकर की सुविधा मिलती है सो अलग. ऐसी स्थिति में कौन रसूखदार अफसर सुख सुविधाएं छोड़कर वर्किंग प्लान बनाएगा. वन मंत्री विजय शाह ने वर्किंग प्लान बनाने वाले अफसरों के साथ अनुसंधान एवं विस्तार शाखा का प्रभार दिए जाने की नई प्रथा लागू की थी. किंतु मौजूदा अफसरों के वर्किंग प्लान बनाने संबंधित जारी आदेश में अनुसंधान एवं विस्तार शाखा का अतिरिक्त प्रभार नहीं दिया गया है.