MP Politics: मध्यप्रदेश में मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा की नई सरकार बन गई है, यह घटना उतनी अप्रत्याशित नहीं है जितनी मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह की विदाई. हालांकि, जो लोग राजनीति की निष्पक्ष जानकारी रखते हैं वह जानते थे कि 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद शिवराज की मुख्यमंत्री के पद से विदाई तय है.

मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री पद से शिवराज सिंह की विदाई जितनी प्रत्याशित उससे अधिक अप्रत्याशित और आश्चर्यजनक था शिवराज सिंह चौहान का मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद का राजनैतिक व्यवहार, जिसकी उनसे ऐसी उम्मीद भाजपा शीर्ष नेतृत्व को कभी नहीं रही होगी.

मोहन यादव के मुख्यमंत्री चुने जाने और मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से शिवराज सिंह का व्यवहार उस एक वरिष्ठ, गंभीर और अनुशासित नेता का कतई नजर नहीं आ रहा है, जिसे पार्टी ने विभिन्न विवादों के बाबजूद करीब 18 साल तक मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए रखा. 

ऐसा लग रहा है कि राजस्थान के विधानसभा चुनावों में पराजित पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की ही तरह वे भाजपा हाईकमान को चुनोती देते नजर आ रहे हैं. वे लाड़ली बहनों के सहारे वर्तमान मोहन यादव सरकार को एक तरह से चुनौती देते नजर आ रहे हैं.

होना तो यह चाहिए था कि 18 सालों तक मुख्यमंत्री रहने के नाते वे पार्टी के प्रति कृतज्ञ होते और मध्यप्रदेश की नई भाजपा सरकार को समर्थन देते, सहयोग करते. यह तो तय है कि उनकी मौजूदा गतिविधियों को भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कतई स्वीकार नहीं करेगा. उनकी इस गतिविधि से उनको इससे कोई लाभ मिलने की संभावनाएं कतई नहीं है. हां, इससे उनके सामने आगे के लिए मुश्किलें बढ़ सकतीं हैं.

जहाँ तक उनको आगे 2023 के विधानसभा के चुनाव के बाद मध्यप्रदेश सरकार की बागडोर न सौंपे जाने का सवाल है तो यह कदम तो बहुत पहले से ही दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ था. भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस बार किसी भी हालत में शिवराज सिंह चौहान को प्रदेश भाजपा सरकार का नेतृत्व सौंपने के लिए कतई तैयार नहीं था। 

भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का यह इरादा उस समय ही उजागर हो गया था जब भाजपा के चाणक्य अमित शाह ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव की पूरी बाग डोर खुद संभाल ली, और चुनाव अभियान संचालन के लिए शिवराज के नेतृत्व को अनदेखा करते हुए नरेंद्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय,ज्योतिरादित्य सिंधिया, प्रह्लाद पटेल, वीडी शर्मा, शिवराज सिंह जैसे प्रदेश के वरिष्ठ भाजपा नेताओं को शामिल कर चुनाव अभियान समिति का गठन कर दिया गया.

नरेंद्र सिंह तोमर इस समिति में संयोजक बनाए गए जबकि शिवराज की हैसियत समिति में एक सामान्य सदस्य की तरह थी. इसका एक कारण यह भी है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व शुरु से ही रेबड़ी संस्कृति के खिलाफ़ रही है. सुप्रीम कोर्ट भी इस फ्रीबीज के खिलाफ चिंता जता चुकी है. शीर्ष बैंक भी इस पर चिंता जता चुके हैं. नवम्बर 2022 में पंजाब, हिमाचल प्रदेश समेत पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए. 

इन चुनावों में आम आदमी पार्टी ने पंजाब की सभी महिलाओं को प्रति माह एक हजार महीना देने समेत, 200 यूनिट तक बिजली समेत कई घोषणाएं कीं. भाजपा को छोड़कर चुनाव लड़ रहे लगभग सभी ने सत्ता प्राप्ति के लिए चुनाव से पहले खूब मुफ्त की रेबड़ियाँ बांटने की घोषणा कर सत्ता हथिया ली. पर गुजरात इसमें अपवाद बना रहा. वह इस तरह की मुफ्त की घोषणाओं के लालच में नहीं आया. पर भाजपा ने कर्नाटक में सत्ता खो दी.

इससे प्रभावित होकर मीडिया में 2023 में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम में सर्वे आने लगे. जिसमें यह स्थापित किया जाने लगा कि इन राज्यों में भाजपा सत्ता से बाहर होने वाली है. इससे शिवराज सिंह अपने हाथ से मध्यप्रदेश की सत्ता जाने से विचलित नजर आने लगे. 

उन्होंने राज्य में शीर्ष नेतृत्व के रेबड़ी संस्कृति पर विरोधी विचार के बाबजूद विकास की कीमत पर लाडली बहना जैसी योजना की घोषणा कर दी, जिसमें पंजाब के समान बिना किसी बेरियर के प्रदेश की महिलाओं को 1000 से 3000 तक रुपए प्रति माह देने की घोषणा कर दी.

इसे देखते हुए कांग्रेस ने महिलाओं को प्रतिमाह 1500 रुपए, की सम्मान निधि 500 रुपए में गैस सिलेंडर, 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली आदि लोक लुभावन घोषणाएं कर शिवराज की चुनावी राह में और कांटे बिछाकर चुनावी लड़ाई को और मुश्किल बना दिया.

भाजपा नेतृत्व, शिवराज सिंह चौहान से 2018 के विधानसभा चुनावों के बाद से ही खुश नहीं था। यह वह समय था जब शिवराज सिंह ने आरक्षण को लेकर ऐसा बयान दिया था उससे पार्टी को नुकसान हुआ और 2018 के चुनाव में भाजपा को 109 सीट पर ही जीत मिली और उससे सत्ता से हाथ धोना पड़ा. जबकि, 2013 में हुए विधानसभा के चुनाव में भाजपा को 165 सीटों पर जीत मिली थी. 

इस तरह 2018 में भाजपा को 2013 के मुकाबले शिवराज के 'माई के लाल' वाले बयान के चलते 56 सीटें कम प्राप्त हुई. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2018 में भी मोदी- शाह के चलते थोड़ी स्थिति सम्मानजनक रही वार्ना 2018 में भाजपा को 70-75 सीटें ही मिलतीं.

2020 मार्च में कांग्रेस में हुए विद्रोह के फलस्वरूप कांग्रेस के 22 विधायकों ने इस्तीफा दिया और भाजपा पुनः शिवराज के नेतृत्व में प्रदेश में सत्तारूढ़ हुई. भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उस समय भी किसी अन्य को मुख्यमंत्री बनाना चाहता था पर उसी समय कोरोना महामारी की विभीषिका के चलते मजबूरीवश शिवराज सिंह को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा.

शिवराज सिंह हाल के चुनाव में विशाल जीत का श्रेय अपनी 'लाडली बहना' योजना को देते हैं. जबकि, विश्लेषक ऐसा नहीं मानते. उनका तर्क है कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में तो अशोक गहलोत एवं भूपेश बघेल ने मध्यप्रदेश से कहीं अधिक लोकलुभावन घोषणाएं की थी. मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने भी 500 रुपये में गैस सिलेंडर, महिलाओं को प्रति माह 1500 रुपये सम्मान निधि और मुफ्त बिजली की घोषणा की थी. यदि ऐसा होता तो उन राज्यों में कांग्रेस सरकारें क्यों नहीं बनीं.