भोपाल: राजधानी में स्थित आयकर भवन में बैठने वाले प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त मप्र-छग मोहनीश वर्मा ने उन्हें राज्य सरकार के संपदा संचालनालय द्वारा आवंटित सी-2/16 चार इमली भोपाल सरकारी आवास के किराये को लेकर लिखित आपत्ति की है। उन्होंने किराये के संबंध में स्पष्टीकरण देने के लिये कहा है। मामले में गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव राजेश राजौरा ने वित्त विभाग से अभिमत मांगा है। ऐसा पहली बार है कि किसी केंद्रीय अफसर ने ऐसी आपत्ति उठाई है।
दरअसल राज्य सरकार राजधानी भोपाल में केंद्र सरकार के कार्यालयों के कतिपय उच्चाधिकारियों को अपने सरकारी आवास संपदा संचालनालय के माध्यम से आवंटित करती है। चूंकि संपदा संचालनालय के आवंटन नियमों में प्रावधान है कि केंद्र सरकार के अधिकारियों से सरकारी आवास का मासिक किराया उन्हें मिलने वाले हाऊस रेंट एलाउन्स यानि एचएआर के बराबर होना चाहिये और केंद्र के बड़े अफसरों का एचएआर बहुत अधिक होता है (करीब 30 हजार रुपये), इसलिये प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त मोहनीश वर्मा ने इस पर आपत्ति की है तथा उन्होंने मासिक किराया उतना ही लेने के लिये राज्य सरकार से कहा है जितना वह अपने अधिकारियों एवं कर्मचारियों से लेती है। यह किराया बहुत कम होता है (करीब ढाई हजार रुपये)।
वर्मा ने इस संबंध में करीब पन्द्रह साल केंद्र सरकार द्वारा जारी उस वित्तीय संहिता का भी हवाला दिया है जिसमें केंद्र के अफसरों से राज्य के अफसरों की तरह ही सरकारी आवास आवास आवंटित करने एवं किराया लेने का प्रावधान है। उन्होंने इसकी प्रतिलिपि भी राज्य सरकार को दी है। चूंकि राज्य सरकार के आवास आवंटन नियम अलग हैं और केंद्र सरकार के प्रावधान अलग, इसलिये गृह विभाग ने ऐसी छूट देने के लिये वित्त विभाग के पास प्रकरण उसके अभिमत के लिये भेज दिया है।
अब वित्त विभाग जो अभिमत देगा, उसी के अनुसार संपदा संचालनालय इस मामले का निराकरण करेगा। यहां यह उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार के भोपाल स्थित अन्य कई कार्यालयों के अधिकारियों से भी संपदा संचालनालय उनके एचआरए के बराबर किराया वसूल रहा है तथा आयकर प्रमुख के अलावा अब तक किसी ने इस पर आपत्ति नहीं ली है।
यदि केंद्र सरकार के कोई प्रावधान हैं तो महालेखाकार ने भी अब तक इस पर कोई आपत्ति नहीं ली है। विभागीय अधिकारी ने बताया कि प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त ने शासकीय आवास के किराये के संबंध में पत्र लिखा है जिसके संबंध में वित्त विभाग से परामर्श मांगा जा रहा है, क्योंकि ऐसी छूट वित्त विभाग ही दे सकता है।