आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मध्यप्रदेश के साथ-साथ पूरे देश को शनिवार एक ऐतिहासिक सौगात दी है। पीएम ने मध्यप्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में नामीबिया से लाए चीतों को छोड़ा। इसके साथ ही 70 वर्ष के बाद एक बार भारत की धरती पर चीता दौड़ने लगा है।
सरकार की इस पहल के बाद चीतों के लेकर उत्सुकता बढ़ गई है लेकिन चीते की खासियतों के बारे में कम ही जानते हैं। चलिए हम आपको बताते हैं चीतों के बारे में कुछ ऐसी ही बातें जो काफी रोचक हैं।
आज पूरी दुनिया में सिर्फ़ अफ्रीका में ही गिने-चुने चीते बचे हैं। भारत सहित एशिया के लगभग हर देश से ये जानवर आज की तारीख में विलुप्त हो चुका है। कहा जाता है, कि चीता दुनिया का सबसे तेज़ रफ़्तार से दौड़ने वाला जानवर है। ये 100 से 120 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकता है। चीता यह रफ़्तार महज 3 सेकण्ड में पकड़ लेता है। जबकि अभी तक कोई भी ऐसी गाड़ी नहीं आई है जो 3 सेकंड में इतनी गति पकड़ सकती हो।
चीतों के बच्चे भी बड़ी मुश्किल से बचते हैं और शायद यही इस जानवर के विलुप्त होने की सबसे बड़ी वजह है। हैरीनी की बात ये है, कि चीतों के 95 फीसदी बच्चे, वयस्क होने से पहले ही मर जाते हैं। यानी चीते के 100 बच्चों में से पांच ही बड़े होने तक ज़िंदा रहते हैं।
वहीं 2013 में अफ्रीका में हुई चीतों पर रिसर्च से पता चला था कि इनके बच्चों के बचने की उम्मीद मात्र 36 फ़ीसद तक ही होती है। चीतों के बच्चों के मरने के पीछे शिकारी जानवर होते हैं। इनमें शेर, लकड़बग्घे, बबून और शिकारी परिंदे शामिल हैं। साथ ही चीतों के रिहाइश वाले इलाक़ों में इंसानी दखल से भी इनकी तादाद घटती जा रही है।
अरब देशों में चीते के बच्चों को पालने के लिए ख़रीदा जाता है।जिसकी वजह से इनकी क़ीमत दस हज़ार डॉलर तक पहुंच जाती है। ये भी चीतों की तस्करी और ख़ात्मे की बड़ी वजह है।यानि कि अब जो चीते भारत लाए गए हैं उनको भी कड़ी सुरक्षा के घेरे में, पूरी निगरानी में रखा जाना है, ताकि इनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
चीता जब पूरी ताक़त से दौड़ रहा होता है तो सात मीटर तक लंबी छलांग भी लगा सकता है। यानि कि चीता 7 मीटर यानी 23 फुट लंबी छलांग लगा सकता है।
चीते के बारे में एक बात और जानिये। शेर और बाघ की तरह चीते दहाड़ नहीं पाते। वो बिल्लियों की तरह गुर्राते हैं, फुफकारते हैं। कई चीतों को कुत्तों की तरह भौंकते भी देखा गया है।
चीते के लिए रात में देखना भी मुश्किल होता है। यानि कि रात में चीतों की हालत इंसानों जैसी ही होती है। इसीलिए चीते, या तो सुबह के वक़्त या भी दोपहर के बाद शिकार करते हैं। चीतों को पेड़ पर चढ़ने में भी दिक्क़्त होती है, यानि कि चीते पेड़ पर भी नहीं चढ़ पाते।
वहीं मादा चीते की ज़िंदगी भी बड़ी चुनौतीपूर्ण होती है, उसे औसतन अपने नौ बच्चों को अकेले ही पालना पड़ता है। इसका मतलब ये हुआ कि उसे हर दूसरे रोज़ शिकार पर जाना होता है, ताकि वो अपने बच्चों का पेट भर सके। वहीं शिकार करने के दौरान उसे अपने बच्चों की निगरानी और देखभाल भी करनी पड़ती है, ताकि वो अपने बच्चों को खतरनाक जानवरों से बचा सके।
अपने छोटे बच्चों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना भी मादा चीता के लिए बड़ा चुनौतीपूर्ण होता है। मादा चीता सिर्फ़ सेक्स के लिए नर चीते से मिलती है। सेक्स के बाद दोनों फिर से अलग-अलग हो जाते हैं। इस दौरान अगर बच्चे हैं तो उन्हें अपना ख़्याल ख़ुद रखना होता है।
मादा के मुक़ाबले नर चीते, अपना दोस्ती वाला गैंग बना लेते हैं। दोखा जाए तो एक झुंड में चार-पांच चीते होते हैं और इनमें ज़्यादातर तो भाई ही होते हैं। यानि कि एक ही मां-बाप की संतानें। मगर कई बार झुंड में बाहर से भी कई सदस्य आ जाते हैं, बाहरी के आने का नर चीते बुरा भी नहीं मानते।
चीते का सिर बाघ, शेर, तेंदुए और जगुआर की तुलना में काफी छोटा होता है। इससे तेज रफ्तार के दौरान उसके सिर से टकराने वाली हवा का प्रतिरोध काफी कम हो जाता है। चीते की खोपड़ी पतली हड्डियों से बनी होता है। इससे उसके सिर का वजन भी कम हो जाता है। हवा के रेजिस्टेंस को कम करने के लिए चीते के कान बहुत छोटे होते हैं।