भोपाल: राज्य का वन विभाग प्रदेश के कतिपय वन वृतों में औषधीय गुणों वाले गुग्गल का रोपण करायेगा। भारत में यह गुजरात, असम, राजस्थान, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में ही पाया जाता है। गुग्गुल का पेड़ एक छोटा, झाड़ीदार पेड़ है और इसमें कांटेदार शाखाएं होती हैं।
यह अपनी छाल पर पाई जाने वाली छोटी-छोटी नलिकाओं में पीले रंग का गोंद राल बनाता है। प्राकृतिक गुग्गल की विलुप्त होती जा रही प्रजाति बचाने के लिए मुरैना में 10 हजार पौध की नर्सरी तैयार की गई है। नर्सरी के पौधों को विकसित होने के बाद चंबल के बीहड़ों में उगाकर गोंद व औषधि का उत्पादन किया जायेगा।
गुग्गल की प्राकृतिक प्रजाति के एक-एक पेड़ में 300 से 500 ग्राम वजन तक गोंद प्राप्त होता है। औषधियों के निर्माण के लिए प्रतिवर्ष 1600 टन गोंद की जरूरत के विपरीत देश में सिर्फ 10 टन गोंद ही पैदा हो रहा है। प्राकृतिक गुग्गल आयुर्वेद में 60 प्रकार की बीमारियों की औषधि में उपयोग किया जाता है।
खास तौर पर जोड़ों के दर्द, अस्थमा व हृदय से संबंधित रोगों की दवा गुग्गल से तैयार की जाती है। चंबल संभाग के मुरैना, भिंड व श्योपुर जिले में औषधीय खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रशासन व उद्यानिकी विभाग समन्वय बनाकर काम कर रहा है। इससे युवाओं को आजीविका के लिए बेहतर रोजगार मिलने की संभावनाएं प्रबल हुई हैं। अभी भी जंगलात में रह रहे सहरिया आदिवासी औषधीय फसलों की खेती कर अपने परिवारों की आजीविका चला रहे हैं।
सभी वन वृत्त प्रमुखों से वन विभाग ने कहा है कि वे नरम मिट्टी में गढ्ढे खोदे एवं लकड़ी या बांस के खम्बों से फॅेंसिंग करे। कीटों का प्रकोप होने पर क्लोरोपाई रिफास का उपयोग किया जाये और यदि फफूंद का प्रकोश हो रहा है तो नीला थोथा एवं चूने के मिश्रण का उपयोग किया जाये। इसमें लगने वाली मजदूरी की गणना 370 रुपये प्रति दिन मानव दिवस के आधार पर की जायेगी। ई-ग्रीन वॉच पोर्टल में यह रोपण दर्ज किया जाकर इसकी मॉनिटरिंग की जायेगी।