हरदा के समीप पटाखा फैक्टी में विस्फोट के दो दिन बाद भी लोग बदहवास हैं। प्रशासन कार्रवाई कर रहा है। मगर जो लुट गया है वह वापस आना मुश्किल है। हत्यारी पटाखा फैक्ट्री पर यदि प्रशासन संवेदनशील होता तो तय था कि यह हादसे के काफी पहले ही बंद हो चुकी होती।

दरअल काफी पहले कलेक्टर ने फैक्ट्री का लायसेंस निरस्त कर उसे सील कर दिया था, लेकिन फैक्ट्री मालिक राजेश अग्रवाल ने हरदा कलेक्टर के आदेश के खिलाफ अपील की और मामला संभागायुक्त कोर्ट में आ गया। यहां तत्कालीन हरदा एसडीएम की रिपोर्ट और तत्कालीन कलेक्टर हरदा के आदेश को दरकिनार कर उसे स्टे दे दिया गया और फैक्ट्री चालू हो गई।

सूत्रों की माने तो तत्कालीन नर्मदापुरम कमिश्नर मालसिंह ने सुनवाई के दौरान अगली पेशी तक के लिए स्टे दिया था लेकिन इस अस्थाई और तात्कालिक स्टे की आड़ में फेक्ट्री निरंतर चलती रही।

माना जा रहा है कि मौत की इस फटाका फैक्ट्री मामले की बारीकी से पड़ताल की जाए तो एक बड़ा खुलासा होगा। बताते हैं कि संभागायुक्त के एक स्टोनो ने फैक्ट्री मालिक के समर्थन और पक्ष में कुछ तकनीकी दस्तावेज जुगाड़ कर फाइल में लगाए थे और इन्हीं आधार पर फैक्ट्री को स्टे मिल गया। हो सकता है इस मामले की हकीकत तेजी से चल रही जांच में खुले।

नर्मदापुरम के प्रशासनिक गलियारों में इस बंद फैक्ट्री को खुलवाने में तत्कालीन संभागायुक्त के स्टोनों की खास चर्चा है। कहा तो यह भी जा रहा है कि वह विस्फोटक अधिनियम का खासा जानकार है। लिहाजा एसडीएम की जांच रिपोर्ट में गलियां ढूंढीं, तथ्यों को मरोड़ा व ऐसे तकनीकी दस्तावेज फाइल में लगाए, जिसके चलते संभागायुक्त ने स्टे दे दिया।