भोपाल। मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को अपनी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विश्वास पुनः अर्जित करने में बड़ी मशक्कत करना पड़ रही है। लम्बे समय से सत्तासीन भाजपा से उसके अपने कार्यकर्ताओं के साथ ही संघ के स्वयंसेवकों में भी नाराजगी का भाव आ गया है, जिसके चलते उन्होंने चुनाव से दूरी बना ली थी, यही नहीं संघ के पूर्व प्रचारको ने तो एक नए राजनीतिक दल का गठन कर भाजपा के समानांतर उम्मीदवार भी मैदान में उतार दिए। बीते एक सप्ताह में विचार परिवार के सदस्यों ने भाजपा को समर्थन देने के लिए जो पहल की है, उससे विधानसभा चुनावों  में चुनौतियों से जूझ रहीं भाजपा संघर्ष में फिर से लौट सकी है।

बीजेपी का ये स्वभाव बन गया है कि सत्ता में रहते हुए पार्टी अपने छोटे कार्यकर्ताओं को जाने अनजाने में उपेक्षित कर देती है, नतीजतन देव दुर्लभ कार्यकर्ता खुद को ठगा सा महसूस करता है। अब जबकि चुनावी चुनौतियां सामने है ,तो फिर मुकाबले के लिए उसे अपने कैडर बेस संगठन की ताक़त की जरूरत पड़ रही है । नाराज कार्यकर्ता खुलकर मैदान में दिखाई नहीं दे रहा है इस चिंता ने न केवल पार्टी के स्थानीय नेताओं बल्कि केंद्रीय नेतृत्व की भी नींद उड़ा दी थी दिल्ली से आए अमित शाह ने भाजपा के कार्यकर्ताओं को रिचार्ज किया और मंडल स्तर तक अपनी बात पहुंचाई तब जाकर माहौल बदला संघ परिवार के अनुषांगिक संगठनों ने भी मोर्चा संभाला, तब जाकर भाजपा मुकाबले में फिर से खड़ी हो सकी है।

वर्ष 2003 के बाद मध्य प्रदेश के इतिहास में 20 साल बाद ये देखने को मिल रहा हैं कि बड़े नेताओं को कार्यकर्ताओं की पूछपरख  बढ़ानी पड़ रही है। पहले भाजपा के अनुशासित कार्यकर्ताओं को पार्टी के बड़े नेताओं ने मनाया और अब संघ के स्वयंसेवको को मैदान संभालने का अनुरोध किया  किया गया। चुनावी मुद्दे पर सार्थक बहस हो या मतदाताओ को इनफ्लुएंस करने का कोई अवसर, विचार परिवार का प्रबोधन जरूरी होता है। वर्ष 2003 को 2008,2013, तक बीजेपी ने अपने अंदर बुराई नहीं पैदा की थी लेकिन 2018 तक आते आते भाजपा ने अपने अंदर सत्ता की मलाई इस कदर लगा ली कि वह अपने असली सिपाहियों को विस्मृत कर गई। पिछले विधानसभा चुनाव 2018 में अवाम इसका परिणाम देख चुकी हैं । वर्ष 2023 में भाजपा के लिए एंटी इनकंबेंसी जैसे संकट का समय आया है तो संघ और भाजपा के भी कार्यकर्ता मैदान में आ डटे हैं ।

भाजपा के समानांतर संघ के उम्मीद्वार

एक हैरतअंगेज घटनाक्रम के चलते देश भर में चर्चित इन्दौर विधानसभा क्रमांक एक से पूर्व संघ प्रचारक और जनहित पार्टी के संस्थापक अभय जैन ने चुनावी मैदान में उतरने का मन बना लिया है। ज्ञात हो कि इन्दौर विधानसभा क्षेत्र क्रमांक एक से भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय की उम्मीदवारी के बाद यह विधानसभा राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गई है। अब यहां से कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ संघ प्रचारक अभय जैन के चुनाव लडने की खबर ने प्रदेश के राजनीतिक हलकों में सनसनी फैला दी है। बता दें कि जनहित पार्टी के संस्थापक और पूर्व प्रचारक अभय जैन ने पार्टी स्थापना की भोपाल में हुई रैली में भी पहले तो एक नम्बर इन्दौर सीट से चुनाव लडने की संभावना जताई थी परन्तु उसके बाद इन्दौर में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पार्टी के अन्य सदस्यों की राय का हवाला देते एक नम्बर से कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ चुनाव में उतरने का निर्णय बदल लिया था। तब कारण पार्टी की प्रदेश में अन्य स्थानों पर उनकी सक्रियता आवश्यक होना बताया था परन्तु अब उन्हें इन्दौर विधानसभा एक नम्बर से जनहित पार्टी ने अपना प्रत्याशी बनाया है। जनहित पार्टी ने जारी अपनी दूसरी सूची में इन्दौर एक से अभय जैन को तो इन्दौर दो से मेहुल गरजे को उम्मीदवार घोषित किया है। वहीं निवाड़ी से रामाधार वशिष्ठ, सतना से दीपशिखा सिंह, भोपाल गोविन्द पुरा से विशाल बिंदल, शाजापुर से हरिसिंह ठाकुर, खंडवा से प्रकाश ऐकले, पंधाना से श्रीमती छाया गोरे उम्मीदवार हैं।