ट्रेनों को बार-बार डायवट और निरस्त किया जा रहा है। इसकी वजह से रेल यात्री परेशान है। उन्हें ऐनवक्त पर दूसरी ट्रेनें खोजनी पड़ रही है, जो नहीं मिलती। यही नहीं आर्थिक रूप से भी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
जिन ट्रेनों को निरस्त किया जाता है उनमें पहले से सामान्य किराये पर बुकिंग कराते हैं, इन्हें निरस्त करने की स्थिति में अधिक फ्लेक्सी फेयर वाला किराया चुकाना पड़ता है, जो कि अधिक होता है। पिछले तीन महीने में भोपाल रेल मंडल से गुजरने वाली 300 ट्रेनों को निरस्त व डायवर्ट किया जा चुका है। इनमें ऐसी ट्रेनें भी शामिल है, जिन्हें अब तक चार से पांच बार निरस्त किया जा चुका है।
ऐनवक्त पर निरस्त कर रहे ट्रेनें
रेलवे ट्रेनों को निरस्त करने की सूचना पहले से नहीं दे रहा है, बल्कि यात्रा की तारीख से एक दिन पहले से लेकर एक सप्ताह पहले ही दे रहा है। जबकि यात्री बार- बार मांग कर चुके हैं कि ट्रेनों को निरस्त व डायवर्ट करने की सूचना कम से कम 15 दिन पहले से लेकर एक महीने पहले से दी जाए।हाल ही में रेलवे ने बरखेड़ा - बुधनी के बीच तैयार तीसरी रेल लाइन को जोड़ने समेत अन्य कामों के लिए थोकबंद ट्रेनें निरस्त की गई हैं।
इन कामों का हवाला देता है रेलवे
ट्रैक के रख-रखाव का काम करने का हवाला दिया जाता है या फिर नई पटरियों को पुरानी पटरियों से जोड़ने की बात कही जाती है। दोनों ही काम सेफ्टी से जुड़े है इसलिए दूसरे विभाग भी आपत्ति दर्ज नहीं करा पाते हैं। इस काम के नाम पर थोक में ट्रेनों को निरस्त किया जा रहा है। जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्व में भी ट्रैक का रख-रखाव होता रहा है, तब इतनी ट्रेनों को निरस्त नहीं किया जाता था।
रेल अधिकारियों की कमजोरी
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रैक का रख-रखाव करना एक नियमित प्रक्रिया है। इसका शैड्यूल पहले से अधिकारियों को पता होता है। यदि अधिकारी इस नियमित रख-रखाव के लिए ट्रेनों को निरस्त करने की सूचना ऐनवक्त पर दे रहे हैं तो यह बड़ी कमी है। इसमें तत्काल सुधार करने की जरूरत है। ऐनवक्त पर ट्रैक व पटरियों में खराबी या फिर सेफ्टी से जुड़े किसी अन्य यंत्रों में सुधार की जरूरत को तो नहीं नकारा जा सकता। यह यात्रियों की जानमाल से जुड़ा विषय होता है।