भोपाल: प्रदेश में अपराधों में बालकों की उम्र का गलत निर्धारण हो रहा है जिससे आरोपी को लाभ मिल रहा है। पीएचक्यु भोपाल में अपराध अनुसंधान शाखा के स्पेशल डीजी जीपी सिंह ने सभी जिला पुलिस प्रमुखों को सर्कुलर जारी कर उम्र का सही तरीके से निर्धारण करने के निर्देश दिये हैं।
सर्कुलर में कहा गया है कि यह देखा जा रहा है कि ऐसे आपराधिक मामले जिनमें बालक की आयु 18 वर्ष से कम प्रमाणित किया जाना आवश्यक होता है उनमें बालक की आयु का अवधारण विधिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं किया जा रहा है जिसका लाभ आरोपी को प्राप्त हो रहा है। जबकि किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम 2015 की धारा 94 में बालक की आयु के अवधारण के संबंध में प्रावधान दिये गये है, जिसके अनुसार निम्न प्रकार से बालक की आयु का अवधारण किया जाता है:-
एक, विद्यालय से प्राप्त जन्म तारीख प्रमाण पत्र या संबंधित परीक्षा बोर्ड से मेट्रिकुलेशन या समतुल्य प्रमाण पत्र, यदि उपलब्ध हो, और उसके अभाव में,
दो, निगम या नगर पालिका प्राधिकारी या पंचायत द्वारा दिया गया जन्म प्रमाण पत्र।
तीन, उपरोक्त दोनों के अभाव में, आयु का अवधारण अस्थि जांच या कोई अन्य नवीनतम चिकित्सीय आयु अवधारण जांच के आधार पर किया जाएगा।
उपरोक्त दस्तावेज के अभाव में अधिकांश आपराधिक प्रकरणों में आयु का अवधारण अस्थि जांच के आधार पर किया जाता है, किन्तु रेडियोलॉजिस्ट द्वारा अपनी रिपोर्ट में निश्चित आयु न लेख करते हुये प्लस माईनस टु ईयर्स के साथ आयु लेख की जाती है (जैसे 14-16 वर्ष)। ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि बालक की आयु का अवधारण करने के लिए अन्य नवीनतम चिकित्सीय आयु अवधारण जांच का उपयोग भी किया जाना चाहिए, जिसमें दंत चिकित्सा आयु मूल्यांकन कालानुक्रमिक आयु के सबसे विश्वसनीय तरीकों में से एक है। इसलिये ऐसे प्रकरण जिनमें उपरोक्त दस्तावेजों के अभाव में बालक की आयु का निश्चित अवधारण किया जाना हो उनमें दंत चिकित्सा आयु मूल्यांकन जांच के द्वारा बालक की आयु का अवधारण किया जाना चाहिए।