मप्र के मुख्यसचिव इकबाल सिंह बैंस के रिटायरमेंट की तारीख करीब आने के बाद प्रशासनिक गलियारों में इस पद को लेकर खासी सरगर्मी है। उन्हें फिर एक्सटेंशन मिलेगा या नया अधिकारी नियुक्त होगा, इस पर कयासबाजी हैं। अभी मप्र में चुनाव आचार संहिता लागू रहने की वजह से सरकार से ज्यादा महत्वपूर्ण रोल अब चुनाव आयोग का हो गया है। इसलिये वरिष्ठता के आधार पर पर नए मुख्य सचिव की नियुक्ति की चर्चा भी चल पड़ी है।
इनमें वीरा राणा, अनुराग जैन, मो. सुलेमान के नाम उभर रहे हैं। यह भी दिलचस्प होगा कि यदि आचार संहिता के दौर में 'नया' मुख्यसचिव पदस्थ हुआ भी तो उस अफसर को कितने दिन काम का मौका मिलेगा, सात दिन या पंद्रह दिन? क्योंकि नियुक्ति के तीन दिन बाद चुनाव परिणाम आयेंगे। जाहिर है कि सत्ता में भाजपा लौटी या कांग्रेस, दोनों अपने मुताबिक जमावट करेंगे।
बैंस आगामी तीस नवंबर को अपनी सेवावृद्धि अवधि समाप्त होने के चलते रिटायर हो रहे है। इसलिए निर्णय चुनाव आयोग के पाले में है। हालांकि कल जब चर्चा उड़ी कि आयोग ने बैंस की सेवावृद्धि को मंजूरी दे दी है, तो मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय ने खंडन करने में देरी नहीं की। दरअसल, शिवराज सरकार ने मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैंस को छह-छह माह करके दो बार सेवावृद्धि दिलाई है।
अब नए मुख्य सचिव को लेकर पांच दिन में निर्णय जरूरी हो गया है। बैंस को सेवावृद्धि या वरिष्ठता के अनुसार किसी अन्य अधिकारी को मुख्य सचिव का प्रभार देने का निर्णय होगा। यदि सेवावृद्धि नहीं दी जाती है तो प्रदेश में 1988 बैच की अधिकारी वीरा राणा सबसे सीनियर हैं वहीं 1989 बैच के अनुराग जैन व मोहम्मद सुलेमान और फिर विनोद कुमार का नाम आता है। चूंकि जैन अभी केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर हैं दो मप्र में मौजूद चौथे अफसर का नाम आ रहा है।
बैंस ही होंगे बॉस ?
हालांकि अंदरखाने चर्चा है कि सरकार की कोशिश नई सरकार के गठन तक इकबाल सिंह बैंस के सेवाविस्तार की है, इसके लिए प्रस्ताव भी जा सकता है। क्योंकि तीन दिन बाद पूरे प्रदेश में मतगणना है, ऐसे में नया मुख्य सचिव अपना कामकाज कैसे जमा पाएगा यह भी सवाल है ? इन स्थितियों में बैंस को कुछ दिन के एक्सटेंशन की संभावना बनती है। वरिष्ठता के मान से मप्र कॉडर में कई वरिष्ठ अफसर हैं, इनमें से कई केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर हैं। संभवतः आचार संहिता के बीच तत्काल उन्हें प्रदेश वापस नहीं लाया जा सकता। हालांकि कुछ दिन के लिये इस 'समस्या' का समाधान चुनाव आयोग प्रदेश के वरिष्ठ अफसर को कमान देकर भी निकाल सकता है। मगर इस मामले में सभी पक्ष एकदम खामोश हैं।