गुजरात चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत असर मध्यप्रदेश की राजनीति में दिखाई देने की पूरी संभावना जताई जा रही है। गुजरात में भाजपा ने जिस तरह 2017 के चुनाव से सबक लेकर अपना जनाधार बढ़ाने आदिवासियों के बीच पैठ बनाई अब वही फैक्टर मध्यप्रदेश में भी भाजपा के लिए निर्णायक हो सकता है।
गुजरात की आदिवासी सीटों पर इस बार भाजपा की एकतरफा जीत से कांग्रेस सकते में है। मध्यप्रदेश से सटे दाहोद जिले की सभी 6 सीटों में भाजपा ने कांग्रेस को करारी शिकस्त दी है। मध्यप्रदेश के झाबुआ से लगा हुआ दाहोद कांग्रेस का गढ़ माना जाता था लेकिन यह भाजपा ने कांग्रेस के इस गढ़ को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।
मध्यप्रदेश में भी 2018 विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार का एक प्रमुख कारण आदिवासी सीटें का हाथ से छिटकना माना गया था। चुनाव में आदिवासी सीटों पर कांग्रेस की जीत का एक अन्य कारण तथा आदिवासी संगठन जयस द्वारा कांग्रेस का खुलकर समर्थन था। ऐसे में 2018 से सबक लेकर भाजपा गुजरात की ही तरह सभी आदिवासी सीटों पर चुनाव जीतने के लिए बड़ी व्यापक रणनीति में काम कर रही है।
सरकारी योजनाओं के माध्यम से आदिवासियों को जोड़ा जा रहा है वहीं पेसा एक्ट के कानून लागू करके आदिवासियों को अधिकार दिए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री शिवराज खुद पैसा जागरूकता समेलन से आदिवासियों को भाजपा की तरफ आकर्षित कर रहे हैं। संगठन व सरकार के जनजाति गौरव दिवस जैसे कार्यक्रम इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं।
इस बार जायस ने भी कांग्रेस से अलग रास्ता पकड़ लिया है। जयस ने इस बार 80 सीटों पर उम्मीदवार उतारने के संकेत दिए हैं। ऐसे में यह कहा जा रहा है कि जो काम आम आदमी पार्टी ने गुजरात में किया वह जयस मध्यप्रदेश में कर सकती है। अगर ऐसा होता है और कांग्रेस आदिवासी सीटों को गँवा देती है तो उसका सरकार बनाने का सपना किसी भी हाल पूरा नहीं होगा।
वैसे तो आदिवासियों को कांग्रेस का मूल वोटर माना जाता है वहीं भाजपा की हमेशा से रणनीति यही रही है कि कांग्रेस के मूल वोटर को छीन कर अपने पाले में ला लिया जाए। मध्य प्रदेश के चुनाव में आदिवासी वोट को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है कहां तो यह जाता है कि जिस ओर आदिवासी जाता है उसी की प्रदेश में सरकार भी बनती है।