भोपाल: रायसेन के घने जंगल में भोपाल के मुस्लिम युवक ने 1200 साल पुराने मंदिर के अवशेष ढूंढ़ निकाले। इसकी खासियत है कि यह परमार काल में बना है। मंदिर के पास ही एक प्राचीन बावड़ी भी बनी है। जो जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। दरअसल, भोपाल निवासी इम्तियाज अली रायसेन गए थे। वहां पर बाड़ी तहसील के नीलगढ़ गांव में जंगल विजिट के दौरान उन्हें एक टीला दिखाई दिया। पत्तों वे रेत से ढंके इस टीले को के बीच पत्थरों को हटाना शुरू किया तो दंग रह गए। यहां हजारों साल पुराने मंदिर के अवशेष दिखे। इस पर जिज्ञासा बढ़ी तो जंगल में चारों ओर घूमकर देखा तो मंदिर के शिखर पर लगने वाले अमलक शिला और दरवाजे के ऊपर लगने वाली सिरदल व अन्य अवशेष पड़े मिले। इनके ऊपर भव्य कलाकृति और देवकोष्ठ (डिजाइन) की हुई है। अली ने भाेपाल में पुरातत्व विभाग के अफसरों को अवगत कराया है। ताकि इसका संरक्षण हो सके और यहां जमीन की खुदाई की जाए तो कई मंदिर व हेरिटेज संपदा निकल सकती है।

अली के मुताबिक, जंगल में मंदिर के अवशेष देखकर चौंक गया। यहां पास में एक 40 घरों का गांव है जहां गोंड आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं। इनकी करीब तीन से चार पीढ़ियां रहती आई है। मंदिर के बारे में लोग कहते हैं कि बड़े-बुजुर्गों से सुना है कि यहां एक भव्य मंदिर थाl मुझे लगता है कि आक्रांताओं ने इस मंदिर को ताेड़ा होगा। सोमवार को पुरातत्व विभाग के प्रमुख सचिव को प्रमाण सहित पत्र दिया जाएगा।
पुरातत्व एक्सपर्ट व्यू
मंदिर के अवशेष देखने से प्रतीत होता है कि ये 12वीं सदी का परमार काल का मंदिर है। इसके शिखर के ऊपर संतुलन बनाए रखने के लिए अमलक शिला लगी है। दरवाजे पर लगने वाला सिरदल भी भव्य है। इससे लगता है कि यह मंदिर विशालकाय और करीब 50 फीट ऊंचाई का होगा। पत्थरों की डिजाइन भी देव कोष्ठ है। मंदिर के पास बावड़ी है। जो कि प्राचीन परंपरा के निशान है क्योंकि मंदिर व बावड़ी का गहरा संबंध है। परमार शासक 972 में स्वतंत्र रूप से स्थापित हुए और उपेंद्र पहले स्वतंत्र परमार शासक थे। जबकि 1305 में महलक देव आखरी परमार शासक थे, जिन्हें अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने हराया था।

मंदिर के जीर्ण-शीर्ण होने के तीन कारण होते हैं। भूकंप या बाढ़ में या फिर आक्रांताओं का तोड़ना। लेकिन इस मंदिर के अवशेष देखने से लगता है कि भूकंप या बाढ़ के दौरान क्षतिग्रस्त हो गया होगा। आक्रांताओं के तोड़ने के निशान नहीं लग रहे। डॉ.अहमद अली, पुरातत्ववेत्ता, मप्र राज्य पुरातत्व