सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल है, जिसमें कुछ आलू के जैसे कुछ सामान दिखाई दे रहे हैं। लेकिन असल में ये आलू नहीं हैं ये आलू के जैसे दिखने वाले वो पत्थर हैं, जिनसे गोटमार खेल होता है। कभी छोटी-छोटी गोटियों से या कंकड़ों से खेला जाने वाला यह खेल अब पत्थर मार बन गया है।  

छिंदवाड़ा का सालों पुराना गोटमार मेला.. यहां दोनों दो तरफ़ से पत्थर बरसते हैं, जिसकी वजह से हर ,साल सैकड़ों लोग घायल हो जाते हैं, तो कईयों को तो अपनी जान से तक हाथ धोना पड़ता है। 

हर साल इस मेले को देखने के लिए काफी संख्या में है लोग पांढुर्ना में पहुंचते हैं। वहीं यहां पर भारी पुलिस बल की भी तैनाती की जाती है, ताकि लोगों को केवल इस खेल को सांकेतिक रूप से खेलने के लिए प्रेरित किया जा सके। 

जाम नदी के दोनों ओर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता है। इसमें सावरगांव पक्ष के लोग पलाश के झंडे को पांढुर्ना सावरगांव के बीच बहने वाली जाम नदी के बीच झंडे को स्थापित करते हैं। जिसके बाद पूजा-अर्चना कर गोटमार की प्रक्रिया शुरू होती है। इसमें दिन-भर दोनो पक्षो के लोग एक दूसरे पर आमने-सामने पत्थर बरसाते हैं। जिससे सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल होते हैं। 

पोला पर्व के दूसरे दिन वर्षों पुरानी मान्यता के आधार पर आयोजित होने वाला गोटमार मेला पूरे विश्व मे अनोखा है। वहीं प्रशासन की ये कोशिश रहती है, कि मेले की ये परंपरा सांकेतिक रूप से ही रहे यहां हर साल की तरह पत्थरबाजी न हो। इस बीच जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक और स्थानीय प्रशासन के पूरे अधिकारी तैनात होते हैं। गोटमार मेले की हर एक गतिविधि पर अपनी पैनी नजर बनाए रखते हैं।