भोपाल: पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह द्वारा पोषित जयस मिशन-2023 में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. जयश के राष्ट्रीय संरक्षक एवं कांग्रेस विधायक डॉ. हीरालाल अलावा ने आदिवासी सुरक्षित सभी विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. उनके इस ऐलान से कांग्रेस के कई विधायक सकते में आ गए. अब वे मन ही मन पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को कोसने लगे.
जयस के बढ़ते प्रभाव से धार झाबुआ अलीराजपुर, बड़वानी, रतलाम और खरगोन विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस की जीत के समीकरण बिगड़ते नजर आ रहे हैं. यदि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने जयस को लेकर कोई रणनीति नहीं बनाई तो सत्ता में वापसी का उनका सपना अधूरा रह सकता है. आदिवासी क्षेत्रों के विधायकों एवं पूर्व विधायकों का मानना है कि जयस की ताकत को पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने बढ़ाया है.
पंचायतों के चुनाव में मिली सफलता के बाद जयस के पदाधिकारी आत्मविश्वास से लबरेज नजर आ रहे हैं. यही वजह है कि कांग्रेस विधायक डॉ. हीरालाल अलावा आदिवासी प्रभावित 84 विधानसभा क्षेत्रों में जयस से प्रत्याशी खड़े करने की घोषणा कर चुके हैं. इस घोषणा के साथ ही अब वे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ से पार्टी को लेकर सौदेबाजी करने के मूड में हैं.
खरगोन जिला अध्यक्ष झूमा सोलंकी जिला अध्यक्ष पद से इसीलिए इस्तीफा दिया ताकि वह अपने विधानसभा क्षेत्र बिकन गांव में जयस के घुसपैठ को रोक सके. कमलनाथ के किचन कैबिनेट विधायक रवि जोशी के लिए भी जयस हार का सबब बन सकता है. इसी प्रकार भगवानपुरा विधानसभा क्षेत्र भी जयस कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगा रहे हैं. रतलाम की सैलाना और रतलाम ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस के लिए जयस चुनौती बन गई है.
इसी प्रकार कुक्षी, धरमपुरी, गंधवानी, सरदारपुर, जोबट, झाबुआ, पेटलावद, सेंधवा, घोड़ाडोंगरी और भैंसदेही विधानसभा क्षेत्रों में भी जयस कांग्रेस की जीत के समीकरण को बिगाड़ रही है. गंधवानी विधायक उमंग सिंगार का कहना है कि गैस को बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए बीजेपी की जनजागृति संगठन जैसी सामाजिक संगठन कांग्रेस को बनानी होगी बल्कि उसे सक्रिय करना होगा.
आदिवासी इलाकों में जयस का बढ़ता प्रभाव-
दूसरी तरफ है जय युवा आदिवासी संगठन यानी जयस जो अभी एक राजनीतिक दल नहीं है लेकिन जयस का प्रभाव आदिवासी क्षेत्रों पर बढ़ता जा रहा है. जयस ने शहरी इलाकों के बजाय ग्रामीण आदिवासी इलाकों पर फोकस करते हुए पंचायत चुनाव में अपने समर्थित उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था. जयस का दावा है कि उसके 864 सरपंच, 97 जनपद सदस्य और 25 जिला पंचायत सदस्य चुने गए हैं.
रोचक और अलग होगा 2023 का घमासान-
अब आम आदमी पार्टी और जयस दोनों ने राजनीति की शुरुआत बीएसपी, एसपी और गोंडवाना के उलट तरीके से की है. बीएसपी कभी भी स्थानीय निकाय और पंचायत के चुनाव मध्यप्रदेश में नहीं लड़ी. ऐसा ही कुछ सपा और गोंडवाना के साथ रहा. इन्होंने सीधे विधानसभा और लोकसभा में अपनी किस्मत आजमाई. जबकि आप और जयस ने छोटे चुनाव से शुरुआत की है. जो जनाधार बढ़ाने में अहम माने जाते हैं. ऐसे में राजनीति के जानकारों की माने तो जमीनी स्तर से बना जनाधार बड़े चुनाव में फायदा पहुंचाता है. इसलिए कहा जा रहा है कि 2023 का घमासान कुछ रोचक और अलग नजर आ सकता है.
इसलिए बड़ी कांग्रेस-बीजेपी की मुसीबत-
प्रदेश में आदिवासियों की बड़ी आबादी होने से 230 विधानसभा में से 84 सीटों पर उनका सीधा प्रभाव है. 2013 में इनमें से बीजेपी को 59 सीटों पर जीत मिली थी. 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 84 में से 34 सीट पर जीत मिली थी. उसकी 25 सीटें कम हो गईं. इस वजह से बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था. प्रदेश में 2013 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 47 सीटों में से भाजपा ने 31 सीटें जीती थी.
वहीं, कांग्रेस के खाते में 15 सीट आईं. 2018 के चुनाव में आरक्षित 47 सीटों में से भाजपा सिर्फ 16 पर ही जीत दर्ज कर सकी. कांग्रेस ने 30 सीटें जीत ली थीं. एक पर निर्दलीय प्रत्याशी ने जीत दर्ज की थी. ऐसे में इन सीटों पर जयस की संख्या बढ़ती है तो बीजेपी और कांग्रेस के लिए सरकार बनाने की चुनौती होगी. बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही राजनीतिक दल आदिवासी वोटरों को साधने में जुटे हुए है.