जिंदगी दो पहियों की तरह ही हैं जिसे हम थ्योरी और प्रैक्टिकल कह सकते है। दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं और मृत्यु जीवन का वह अंतिम सत्य है जिसे कोई टाल नहीं सकता। शास्त्रों के अनुसार, मृत्यु के पश्चात हिंदू धर्म में नश्वर शरीर को मुखाग्नि दी जाती है।

वैसे लोगों का मानना है कि मृत्यु के पश्चात शरीर किसी काम का नहीं रहता है इसलिए पारिवारिक लोग शरीर को मुखाग्नि देकर विधि-विधान से 12वा-13वा करते हैं ताकि मृतक की आत्मा को शांति मिल सके।

अगर अब हम इसे दूसरे नज़रिए से देंखे तो एक सच यह भी है कि जीवित रहते इंसान का मानव जाति के लिए योगदान भले ही न हो लेकिन उसकी मृत देह जरूर समाज के लिए बड़ा योगदान दे सकती है। चिकित्सा विज्ञान के लिए मृत देह की आवश्यकता किस हद तक है यह किसी भी मेडिकल के छात्र और उसके संस्थान से जाना जा सकता है। 

ये मृत देह मेडिकल के छात्रों को कुछ बेहतर करने के लिए प्रैक्टिकली तैयार कर सकती है और वैसे भी बिना प्रैक्टिकल नॉलेज के मेडिकल की पढ़ाई ही अधूरी है। मेडिकल कॉलेजों के पास प्रैक्टिकल नॉलेज देने के लिए डेड बॉडी या मृत देह का बड़ा संकट है। अब बिना डेड बॉडी के प्रैक्टिकल नॉलेज मिलना तो संभव है नहीं? 

समाज को बड़ा संदेश देने की कोशिश-

इसलिए समाज के कुछ लोग आगे आकर मरणोपरांत देहदान कर रहे हैं। इसी पुनीत सोच के साथ भोपाल निवासी श्याम अवस्थी और उनकी पत्नी सुनीता अवस्थी ने भी मरणोपरांत अपनी देहदान का फैसला किया है। इसके लिए उन्होंने गांधी मेडिकल कॉलेज में बॉडी डोनेशन फॉर्म भर कर सभी औपचारिताएं भी पूरी कर दी हैं। श्याम अवस्थी पत्रकार हैं और उनकी पत्नी SBI से हाल ही में रिटायर हुई हैं।

जब न्यूज़ पुराण ने श्याम अवस्थी और उनकी पत्नी सुनीता से बात की तो उन्होंने बताया कि अक्सर जब डॉक्टर्स से बात होती थी तो वो बताते थे कि मेडिकल के स्टूडेंट की पढ़ाई में ह्यूमन बॉडी नहीं मिलने के कारण काफ़ी तकलीफे आती है। लोग बॉडी दान नहीं करते है इससे पढ़ाई में कई दिक्कते आती हैं।

श्याम अवस्थी का कहना है कि इलाज के लिए तो हम मेडिकल कॉलेज जाते हैं विज्ञान का लाभ उठाते हैं लेकिन जब बारी देहदान की आती हैं तो हम पीछे हट जाते हैं। समाज के इस दोहरे मापदंड को भी हमें तोड़ना चाहियें, इसके लिए मैं आगे आया हूँ।

घर वालों का इस फैसले पर क्या रिएक्शन था इस सवाल के जवाब में श्याम अवस्थी ने कहा कि मेरी पत्नी खुद देह दान में मेरे साथ शामिल है। हम दोनों का फैसला एक ही था इसलिए हमने साथ में बॉडी डोनेट का फॉर्म भरा हैं। उन्होंने आगे कहा कि मीडिया में इसी तरह की सकारात्मक खबरों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जिससे लोग प्रेरित होकर बॉडी दान करें ताकि मेडिकल कॉलेज सुचारू रूप से अपना काम कर सकें, साथ ही बच्चों को भी पढ़ाई में कोई दिक्कत नहीं आये।

अवस्थी दंपत्ति के मुताबिक़, जब देहदान का बच्चों को पता चला तो वे भी सोच में पड़ गए। बच्चों का कहना था कि हमारे होते हुए भी आप देहदान क्यों कर रहे हैं? बच्चों के इस सवाल पर श्याम अवस्थी और उनकी पत्नी सुनीता ने जवाब दिया कि अगर समाज में कोई भी व्यक्ति अगर आगे नहीं आएगा तो बदलाव कैसे होगा?

अवस्थी दंपत्ति का कहना है कि हमारे बॉडी डोनेशन फॉर्म क्रमांक 12 और 13 हैं। यह इस बात को साबित कर रहा है कि देहदान को लेकर अभी भी समाज की सोच बहुत सकारात्मक नहीं है और इसमें व्यापक बदलाव की बड़ी आवश्यकता है।

राजधानी भोपाल के अवस्थी दंपत्ति की यह पहल वास्तव में बेहद अनुकरणीय है। अब समाज को भी इस और आगे बढ़ना चाहिए ताकि डॉक्टर्स को भी प्रशिक्षण के लिए मृत देह की कमी न रहे। समाज को कुशल डॉक्टर्स मिल सके इसके लिए देहदान बेहद जरूरी भी है।