Rajasthan Politics: पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के बाद तीन राज्य मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में प्रचंड बहुमत से सत्ता हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) में मुख्यमंत्री पद के लिए संगठन के अंदर ही सियासी घमासान मचा हुआ है. यहां जीत के लंबे समय बाद भी सीएम चेहरे को लेकर सस्पेंस बना हुआ है.

हालांकि, अब छत्तीसगढ़ में तस्वीर लगभग साफ़ हो गई हैं. यहां पर विष्णुदेव साय 13 दिसंबर को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले सकते हैं. वहीं, मध्य प्रदेश में भी आज शाम तक सीएम चेहरे को लेकर कोई बड़ा अपडेट सामने आ सकता हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि भोपाल बीजेपी दफ्तर में तीन केंद्रीय ऑब्जर्वर और सभी विधायक पहुंच चुके हैं. जल्द ही यहां विधायक दल की मीटिंग शुरू होने वाली है.

परंतु, राजस्थान में बीजेपी की मुश्किलें कम होती तो फ़िलहाल नहीं दिख रही हैं. यहां सीएम पद को लेकर मचा सियासी घमासान ऱोज नए-नए मोड़ ले रहा हैं. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बगावती तेवर कम होते नहीं दिख रहे हैं. नतीजों के बाद से ही वसुंधरा राजे का विधायकों से मिलना संगठन पर भी कई सवाल खड़े करता हैं. इसी से पार्टी आलाकमान नाराज है.

सूत्रों की मानें तो बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी नड्डा ने रविवार रात वसुंधरा राजे को फोन कर नाराजगी जताई. उन्होंने वसुंधरा राजे को सलाह दी कि वह विधायकों के साथ अलग-अलग बैठक न करें. साथ ही सीएम पद का फैसला पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर छोड़ दें.

इस बातचीत के दौरान ही वसुंधरा राजे ने पार्टी अध्यक्ष से अनुरोध किया कि उन्हें एक साल के लिए मुख्यमंत्री बनाया जाए. एक साल बाद वह खुद इस पद को छोड़ देंगी. सूत्रों के मुताबिक, जे.पी नड्डा ने उन्हें विधानसभा स्पीकर के पद का ऑफर दिया था, परन्तु उन्होंने इस पद से साफ़ इनकार कर दिया.

वसुंधरा राजे क्यों मांग रहीं 1 साल के लिए सीएम पद-

अब बड़ा सवाल यह हैं कि वसुंधरा राजे सिर्फ एक साल के लिए ही क्यों सीएम पद मांग रही हैं. इसके पीछे की वजह शायद यह है कि सीएम पद के लिए वसुंधरा राजे से ज्यादा मजबूत दावा दीया कुमारी और बाबा बालकनाथ का है. अगर दीया कुमारी सीएम बनती हैं तो वसुंधरा राजे की सियासत में पकड़ काफी कमज़ोर हो जाएगी. क्योंकि, दीया कुमारी के पार्टी आलाकमान से भी अच्छे संबंध हैं.

राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो यही वजह है कि वसुंधरा राजे एक साल सीएम बनकर दीया कुमारी और अन्य दावेदारों को रेस से बाहर करना चाहती हैं. हालांकि, बाद में आगे भी पद बरक़रार रखने के लिए विधायकों के ज़रिये संगठन पर दबाव बना सकती हैं.