Shivraj Singh Chouhan: प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह के लिए मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के केंद्रीय नेताओं का जमावड़ा सुबह से ही लग गया था. जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत कई राज्यों के मुख्यमंत्री और NDA गठबंधन के नेता भी मौजूद रहें.

हाल ही में संपन्न हुए 2023 के विधानसभा चुनाव को आगामी लोकसभा इलेक्शन का सेमीफाइनल राउंड माना जा रहा था. जिसमें बीजेपी ने इस सेमीफाइनल राउंड में फाइनल की तरह ही प्रदर्शन दिखाते हुए तीन राज्य मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में प्रचंड बहुमत से साथ सत्ता हासिल की हैं.

मध्य प्रदेश में तो अब बीजेपी की नई सरकार का शपथ ग्रहण भी सम्पन्न हो गया है. जिसमें मोहन यादव को मुख्यमंत्री, राजेंद्र शुक्ला और जगदीश देवड़ा को उपमुख्यमंत्री बनाया गया है. वहीं, पूर्व केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को विधानसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर बीजेपी लोकसभा के मद्देनजर जातिगत समीकरण साधने में सफल होती नज़र आ रही हैं.

विधानसभा चुनाव में 230 में से 163 सीटों पर बीजेपी की इस प्रचंड जीत के पीछे मध्य प्रदेश में पीएम मोदी का मैजिक ज़रूर अहम माना जा रहा है. लेकिन, इसमें पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान की ‘लाडली बहना योजना’ ने भी बड़ा रोल प्ले किया हैं. इसे पार्टी से जुड़े नेता भले ही ठुकरा दें परन्तु जनता और राजनीतिक पंडित कभी ठुकरा नहीं सकते.

यहीं वजह है की नई सरकार के गठन से पहले और इस्तीफ़े के बाद करीब 18 साल तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहें शिवराज ने सभी का आभार जताते हुए कहा, मामा का रिश्ता 'प्यार का रिश्ता है' और भैया का रिश्ता 'विश्वास का रिश्ता है', जब तक मेरी सांसें चलेंगी मैं प्यार और विश्वास के रिश्ते को टूटने नहीं दूंगा.
शिवराज का जनता से कितना मजबूत रिश्ता रहा है इसका अंदाजा तो इस्तीफ़े के बाद से ही सोशल मीडिया पर वायरल भावुक तस्वीरों से ही लगा सकते हैं. जहां एक तरफ बहनें भैया शिवराज से लिपटकर रोने लगी. तो वहीं दूसरी तरफ शपथ ग्रहण कार्यक्रम से निकलते ही जनता मामा से लिपट गई.
ये तस्वीरें बताती हैं कि मध्यप्रदेश में मामा-भैया के रिश्तों ने ही बीजेपी को जमीन पर इतने लंबे समय तक मजबूत बनाये रखा. अब बड़ा सवाल यहीं कि लाखों दिलों पर राज करने वाले शिवराज की पार्टी में आगे क्या भूमिका होगी?

राजनीतिक पंडितों की मानें तो बीजेपी आगामी लोकसभा चुनाव में छिंदवाड़ा सहित सभी 29 सीटों पर प्रचंड जीत के साथ वापसी की तैयारी में हैं. पिछले चुनाव में बीजेपी छिंदवाड़ा को छोड़कर बाकी सभी 28 सीटों पर कमल खिलाने में सफल रहीं थी.
क्या शिवराज ही पहनाएंगे मोदी को 29 कमलों का हार-
हाल ही में शिवराज सिंह ने छिंदवाड़ा से बड़ा संकेत देते हुए कहा था कि 2024 में प्रधानमंत्री मोदी को 29 कमल का हार पहनाना चाहता हूं. अब इस बयान को इस तरह भी जोड़कर देखा जा रहा हैं कि क्या शिवराज ही कमलनाथ के गढ़ छिंदवाड़ा से मैदान में उतरकर मोदी जी को 29 कमलों का हार पहनाएंगे. अगर ऐसा होता है तो टक्कर काफी दिलचस्प रहेगी.

चुनावी पंडित इस तरफ भी इशारा करते हैं कि शिवराज को अब जल्द ही केंद्र में बड़ी ज़िम्मेदारी दी जाएगी. यह तक दावा किया गया कि उन्हें नरेंद्र सिंह तोमर के इस्तीफ़े के बाद अब केंद्रीय कृषि मंत्री बनाया जायेगा. क्योंकि, उनके शासनकाल में मध्यप्रदेश के कृषि क्षेत्र में जबरदस्त ग्रोथ का ही परिणाम है कि किसानों की आय में काफी वृद्धि हुई है. साथ ही सिंचाई और फसलों की उत्पादन में भी मध्यप्रदेश ने नया रिकॉर्ड बनाया हैं.

इसके पीछे की बड़ी वजह यह भी हैं कि कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया हैं कि प्रधानमंत्री मोदी अपनी पहली कैबिनेट में ही शिवराज को कृषि मंत्री बनाना चाहते थे. हालांकि, शिवराज ने उस समय इससे इनकार करते हुए मध्यप्रदेश में ही सेवा करने की इच्छा जताई थी.

अब 2023 में “शिव का राज” खत्म होने के बाद और तोमर के इस्तीफ़े से वहीं सवाल क्या शिवराज मोदी कैबिनेट में शामिल होंगे या नहीं? ये सुनाई देने लगा है.
मित्रों अब विदा…. शिवराज-
बीजेपी ने एमपी में शिवराज को ज़रूर पीछे धकेल दिया हों पर उन्होंने जाते-जाते साफ़ कह दिया कि “अपने लिए कुछ मांगने से बेहतर, मैं मरना पसंद करूंगा”. तभी तो जाने से पहले शपथ ग्रहण के दिन कह गए “मित्रों अब विदा.. जस की तस रख दीनी चदरिया”. दरअसल, ये पंक्ति कबीर के एक भजन से ली गई है. कबीर की पंक्तियों से प्रेरित इन शब्दों का अर्थ है कि उन्हें जो पद दिया गया था उन्होंने ज्यों का त्यों वापस कर दिया है.
वैसे भी राजनीति में यूं ही नहीं शिवराज के लिए एक कहावत कही जाती हैं कि वो एक कदम पीछे ज़रूर रखते हैं पर ढाई कदम आगे चलने का हुनर भी जानते हैं. अब मध्यप्रदेश में सभी की नज़र मोदी की जीत के साथ ही संगठन की तरफ से मिलने वाले शिवराज के अगले राजनीतिक सफ़र पर भी टिकी हुई हैं.