मुद्दे और चुनाव: वास्तविक मुद्दे क्यों पीछे हो जाते हैं.. सरयूसुत मिश्रा


चुनावों से ही सरकारें बनती और हटती हैं. चुनाव ही लोकतंत्र का आधार है. चुनाव कोई क्यों हारता है और कोई क्यों जीतता है ? अगर इसको चुनाव प्रचार के मुद्दों और घोषणाओं के आधार पर परखा जाए, तो निराशा ही हाथ लगेगी. चुनाव में विकास के वास्तविक मुद्दे पूरी तौर से गायब दिखते हैं. इसके लिए किसी एक राजनीतिक दल को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. सभी दलों की ओर से ऐसी ही गतिविधियां और प्रचार किया जाता है, जिसमें जनता के विकास के मुद्दे उभरकर नहीं आये और अनावश्यक मुद्दों पर प्रचार की रणनीति केंद्रित रहे. कई बार तो ऐसा लगता है कि शायद यह राजनीतिक दलों का सोचा-समझा प्रयास होता है, क्योंकि जब भी वास्तविक मुद्दे मुख्य भूमिका में होंगे, तो सरकार में रहे हर दल को उन मुद्दों पर किए गए कार्यों से परखा जाएगा.

 

सवाल किया जाएगा और उसी आधार पर चुनाव में जन समर्थन मिलेगा. राजनीतिक दलों  के नेताओं द्वारा चुनाव में जो भाषण दिए जाते हैं, उनमें ऐसे अनावश्यक विवादास्पद मुद्दे उठाए जाते हैं जो मीडिया की सुर्खियां बनें और जनता उन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द चुनाव को देखे. सही मुद्दे से वह भटक जाए और उसके  मत का हरण कर लिया जाए. मध्यप्रदेश में चार उप चुनाव हो रहे हैं. एक लोकसभा और तीन विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं. प्रदेश के दोनों मुख्य दलों- कांग्रेस और भाजपा के बड़े नेता प्रचार में जुटे हुए हैं. अखबारों में हर दिन उनके भाषणों को आमने सामने छाप कर मीडिया भी अपनी भूमिका का निर्वाह कर लेती है, लेकिन भाषणों का जनता के हितों पर और राज्य के विकास पर क्या प्रभाव पड़ेगा इस बारे में  कोई भी सोचने को तैयार नहीं है- न तो भाषण देने वाला न भाषण छापने वाला और न ही भाषण सुनने वाला. एक तरह से भाषण का ही शासन चल रहा है.

 

उस पर होना क्या है, इस पर कोई ठोस बात चुनाव में नहीं होती. आज अखबारों में भाजपा और कांग्रेस के दो बड़े नेताओं की जो खबरें छपी हैं, उसके मुताबिक भाजपा के नेता कह रहे हैं कि जब वह कन्या पूजन करते हैं तब भी कांग्रेस विरोध करती है. इसके जवाब में कांग्रेस के नेता कह रहे हैं कि जब उन्होंने कन्या विवाह के लिए राशि बढ़ाई थी तब उसका भाजपा ने विरोध किया था. इस बात का आज चुनाव में क्या मतलब है? कांग्रेस नेता कभी निक्कर वाली सोच की बात करते हैं, तो कभी भाजपा नेताओं को कमतर बताने के लिए नए-नए जुमलों का प्रयोग करते हैं. कांग्रेस के नेता भी विकास के प्रति अपनी सोच स्पष्ट तरह से नहीं रखते.


जब से देश में भारतीय जनता पार्टी अनेक राज्यों और केंद्र में सत्ता में आई है, तब से बाकी राजनीतिक दलों ने ऐसा मान लिया है कि यह राजनीति का हिंदू काल चल रहा है. इसलिए वह भी हिंदू हितों की बात को ही चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश में जुटे रहते हैं. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने चुनाव में सार्वजनिक सभा में चंडी पाठ शायद इसीलिए किया था कि वह जनता के सामने यह संदेश दे सकें कि वह भी कट्टर हिंदू हैं. यह बात अलग है कि जन्म से जाति का कर्म से कोई संबंध नहीं है. अब यूपी चुनाव सिर पर आ गए हैं, तो वहां भी सभी राजनीतिक दल  अपने राजनीतिक एजेंडा सेट कर रहे हैं. कांग्रेस की नेता प्रियंका गांधी पिछले दिनों वाराणसी में किसान सम्मेलन में माथे पर त्रिपुंड लगाकर सभा में दुर्गा मंत्र का पाठ करती दिखाई पड़ीं.

 

उनका यह प्रयास किस बात के लिए है? यह राजनीति के हिंदू काल में उनकी भी हिंदुत्व की पहचान बनी रहे और चुनावी समर में उन्हें भी समर्थन मिले. प्रियंका गांधी ने यह नहीं बताया कि यूपी में उनका विकास का क्या  एजेंडा है. राहुल गांधी कभी जनेऊपहनते हैं तो कभी मंदिर-मंदिर जाकर दर्शन कर यही संदेश देते हैं कि वह भी हिंदू हितों के संरक्षक हैं. वह अपने आप को कश्मीरी पंडित भी बताते हैं, लेकिन विकास का एजेंडा स्पष्टता के साथ बताने में परहेज करते हैं. यूपी चुनाव में अब्बा जान और राजा महेंद्र सिंह जैसे मुद्दों को उभारा  रहा है .यह मुद्दे समाज के लिए हो सकते हैं लेकिन राजनीतिक दलों के लिए कैसे यह मुद्दे हो सकते हैं? राजनीतिक दल, सरकार में जनता के हित और विकास का काम करते हैं. उन्हें उसी का जवाब जनता को देना चाहिए और जो लोग सरकार बनाना चाहते हैं, उन्हें अपने विकास के एजेंडे पर ही आगे बढ़ना चाहिए. सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर, महंगाई जैसे मुद्दे जो जनता को हलकान करते हैं. उन पर खुलकर कोई बात नहीं करता. जनता के वास्तविक मुद्दे क्यों चुनाव के  मुख्य मुद्दे नहीं बन पाते. चुनाव में राजनीतिक दल घोषणा पत्र जारी करते हैं, जिसमें विकास के एजेंडे पर बात जरूर होती है, लेकिन सरकार में आने के बाद कहने के लिए सरकार घोषणापत्र के अनुरूप काम करती है, लेकिन अधिकांश सरकार के  घोषणा पत्र को रद्दी की टोकरी में डाल देते हैं.


मध्य प्रदेश इसका उदाहरण है. यहाँ  2018 के चुनाव में कमलनाथ मने पेट्रोल और डीजल पर टैक्स कम करने का घोषणा पत्र में वादा किया था, लेकिन सरकार बनने के बाद पेट्रोल और डीजल पर 5% टैक्स बढ़ा दिया गया था. राजनीतिक दल जो वायदा घोषणापत्र में करते हैं, अगर उसके विपरीत सरकार बनने पर काम करते हैं, तो क्या यह उनका आपराधिक कृत्य नहीं है? उनके इस कृत्य के लिए क्या उन्हें अदालतों में नहीं ले जाया जा  सकता? इस बारे में स्पष्ट कानूनी प्रावधान चुनाव सुधारों के द्वारा किया जाना चाहिए, ताकि घोषणापत्र के अनर्गल वायदों पर जनता को गुमराह नहीं किया जा सके. पिछले चुनाव में कांग्रेस ने ₹72000 प्रत्येक नागरिक को देने का वायदा घोषणा पत्र में किया था. इस तरह केवल लुभाने और जनता के मतों को अपहरण करने की नियत से लाए जाते हैं.  विकास के वास्तविक  मुद्दों पर राजनीतिक दल तो चुप्पी साधे रहते हैं, लेकिन जनता की ओर से भी उन मुद्दों पर सवाल नहीं उठता. जनता भी बनावटी और सजावटी भाषणों को ही चुनाव के मुख्य मुद्दे के रूप में मानते हुए मतदानकरें, ऐसी प्रवृत्ति प्रदेश के विकास के लिए बाधक है. आजादी के 75 साल बाद अब जनता में इतनी सामयिक जागरूकता आनी ही चाहिए कि वह अपने जनप्रतिनिधि से विकास के एजेंडे पर सवाल करें और उस सवाल पर जो भी नेता बेहतर और सामयिक  कामकरने के लिए संतोषजनक प्रतीत हो उसे ही अपना मत दें. इस तरह की जन दबाव की राजनीति जब तक चालू नहीं होगी, तब तक विकास के मुद्दे चुनाव में वास्तविक मुद्दे नहीं बन पाएंगे और इसका नुकसान आम लोगों को ही होगा इसलिए वास्तविक मुद्दों के प्रति जागरूकता बढ़ाना आज सबसे अधिक आवश्यक है.