जातिवाद का विष विनाशकारी होगा... सरयूसुत मिश्रा
एक ऐसी जानकारी मिली, जिसने मन को झकझोर दिया. मनरेगा के मजदूरों को जाति के आधार पर मजदूरी का भुगतान किया जा रहा है. पिछले दिनों सरकार ने अनुसूचित जाति एवं जनजाति के मजदूरों को मजदूरी का भुगतान किया है. सामान्य वर्गों के मजदूरों की मजदूरी अभी मध्यप्रदेश में बकाया है. सामान्य वर्ग में ही पिछड़े वर्गों को भी मजदूरी भुगतान के लिए शामिल किया गया है. मेहनत का मेहनताना भी जाति देख कर पहले या बाद में दिया जाएगा, यह तो उस दौर में भी नहीं होता था, जब अशिक्षा के कारण जातिवाद की कुरीति समाज में व्याप्त थी. अब तो जातिवाद धीरे-धीरे जीवन से व्यवहार में समाप्त हो रहा है. केवल राजनीति और कागजों पर ही जातिवाद सक्रिय है. जातिवाद जहां धंधे के रूप में किसी को भी लाभ पहुंचा सकता है, वहीं पर जातिवाद ज्यादा है.
मजदूरी के भुगतान में जाति के आधार पर प्राथमिकता निर्धारित करने की सोच जातिवाद के जहर को कहां तक पहुंकहेगा, यह सोचकर ही सिहरन पैदा हो जाती है. भारतीय शास्त्रों में भारतीय समाज व्यवस्था तथा जीवन पद्धति को जिस जातिवादी बुराई के लिए दोषी ठहराया जाता है, वह जहर धीरे-धीरे समाप्त गया है. जातिवाद कैसे दिखाई और महसूस होता है. जाति के आधार पर जीवन में भेदभाव सार्वजनिक स्थलों पर व्यवहार, जाति के आधार पर लोगों को ऊंचा-नीचा सिद्ध करना, विवाह में जाति के आधार पर भेदभाव करना खानपान में भेदभाव के कारणों से जातिवाद दिखाई पड़ता है. इन सभी बिंदुओं पर यदि हम भारतीय समाज में सदियों पहले और आज के स्थितियों का आकलन करें तो हमें सुखद अनुभूति मिलेगी कि आज हम जातिवाद के जहर से काफी बाहर आ चुके हैं.
पहले कभी छुआछूत बहुत ज्यादा हुआ करता था. कथित नीची जाति के लोगों को मंदिरों में प्रवेश वर्जित था. सार्वजनिक स्थलों पर पानी लेने के लिए ऊंची और नीची जातियों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं थीं. ऊंची जाति के लोग अपने को श्रेष्ठ और नीची जाति के लोगों को महत्वहीन मानते थे. आज ऐसी स्थिति अपवाद स्वरूप कहीं हो तो बात अलग है, लेकिन सामान्य रूप से समाज में अब ऐसा भेदभाव देखने को नहीं मिलता. आज देश में जितने भी हिंदू मंदिर हैं, वहां हजारों लोग रोज दर्शन के लिए जाते हैं.
किसी भी मंदिर में क्या ऐसा होता है कि प्रवेश के पहले यह देखा जाए कि कौन किस जाति का है. जहां तक खानपान में भेदभाव का सवाल है, तो आज पूरे देश में लाखों की संख्या में होटल, ढाबे और रेस्टोरेंट है. यहां पर हजारों लोग हर दिन जाते हैं और भीड़ भाड़ में खानपान करते हैं. किसी के मन में यह विचार नहीं आता कि उनके आसपास कौन से जाति का व्यक्ति बैठा है. यहां तक कि जो वस्तु उनके सामने परोसी जा रही है, उसको किस जाति के व्यक्ति ने बनाया है, इस तरह की सोच भी लोगों को के मन में नहीं आती.
आजकल तो गांव में भी जो सामूहिक सार्वजनिक भोज होते हैं उनमें सभी समाज के लोग शामिल होते हैं. जाति के आधार पर भेदभाव की परिस्थितियां पूरी तौर से खत्म भले न हो लेकिन उनमें कमी तो बड़े पैमाने पर आई है. ऐतिहासिक संदर्भों में भारतीय शास्त्रों और समाज व्यवस्था को जातिवाद के लिए जिम्मेदार बताया जाता है, जबकि पहले जातिवाद की व्यवस्था नहीं बल्कि वर्णव्यवस्था कायम की गई .कालांतर में पेशे को जाति के रूप में मान्यता मिलती गई. जातिवाद की कुरीति बढ़ती गई. पेशे केआधार पर जाति व्यवस्था की अगर आज के संदर्भ में विवेचना की जाए तो यह तो आज भी विद्यमान है. आज हर व्यक्ति यह प्रयास करता है कि उसका बेटा उसके पेशे को अपनाएं ताकि उसे जमी जमाई व्यवस्था मिल जाए और पारिवारिक कौशल भी उसके काम आ जाए. डॉक्टर अपने बच्चे को डॉक्टर बनाना चाहता है.
इसी प्रकार वकील बच्चे को वकील और दूसरे व्यवसाय में लगे लोग अपने बच्चों को उसी व्यवसाय में लाना चाहते हैं. आज राजनीति में भी यही हो रहा है. परिवारवाद की भले कितनी भी बात हो, लेकिन अधिकांश राजनेता अपने बच्चों को राजनीति में आगे बढ़ाते हैं. जो व्यवसायिक लोग होते हैं, वह तो आज भी पुरातन व्यवस्था के अनुसार पारिवारिक व्यापार में ही बच्चों को लगाते हैं. वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए पुरातन भारतीय समाज व्यवस्था में पेशे के अनुसार जो सिस्टम बनाया गया था ,वह गलत नहीं था,
क्योंकि आज भी उसी सिस्टम से लोग काम कर रहे हैं.
सरकार में सभी जातियों को समान स्तर पर लाने के लिए आजादी के समय से ही आरक्षण की व्यवस्था लागू है. इस व्यवस्था की वजह से बड़ी संख्या में शोषित-पीड़ित समाज के लोग समाज में बराबरी पर आए हैं. सर्वहारा वर्ग जो अपने श्रम के बल पर जीवनयापन करता है, उसको मेहनताने का भुगतान भी जाति के आधार पर प्राथमिकता पर देने की सरकारी सोच आरडीएक्स जैसी है. इस सोच का जब विस्फोट सिस्टम में होगा तब एक ऐसा विनाशकारी दृश्य सामने होगा, जिससे कोई भी वर्ग प्रभावित होने से बच नहीं पाएगा.
भारत सरकार में अधिकारियों, मंत्री और प्रधानमंत्री के स्तर पर कार्य का विभाजन कुछ इस तरह से होता है कि हर स्तर पर निर्णय के अधिकार की सीमा निर्धारित रहती है. ऐसी खबर भी आई है कि मनरेगा में जाति के आधार पर भुगतान करने का विवादित आदेश वापस ले लिया गया है. सवाल यह है कि इस तरह का विवादित आदेश निकालने वाली सोच किन लोगों की है. यह आदेश जनप्रतिनिधियों के स्तर पर एप्रूव्ड नहीं था, ऐसा हो सकता है क्योंकि कई बार ऐसी परिस्थितियां बनी हैं. नौकरशाही द्वारा आदेश जारी कर दिए जाते हैं और बाद में सरकार के जनप्रतिनिधियों द्वारा उसे वापस लिया जाता है. मध्यप्रदेश में भी अभी सांडों के बधियाकरण के लिए ऐसा ही एक आदेश जारी किया गया था, जिसे विरोध के बाद सरकार द्वारा वापस लिया गया था. देश में तेजी से समाप्त हो रहे जातिवाद को जीवित रखने में किसका फायदा है ?
अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में भारतीय समाज की को जातिगत के जनगणना के माध्यम से पूरे सिस्टम में फैलाया था. आज भी राजनीतिक लोग जातिगत जनगणना की बात करते हैं. जातिवाद समाप्त करने की जहां बात होना चाहिए,वहां जातिवाद बढ़ाने के लिए जातिगत जनगणना की बात से तो यही लगता है कि शायद जातियों का बाजार राजनीति के लिए मुफीद होता है. भले ही इससे किसी को भी लाभ हो लेकिन राष्ट्र को तो नुकसान ही होगा. जातिवाद के आरडीएक्स को समाज में बढ़ने से रोकना होगा अन्यथा इसका विस्फोट समाज राज्य और राष्ट्र को बड़े संकट में डाल देगा. जातिवाद का सरकारीकरण विनाशकारी होगा.