इस साल के पहले सप्ताह में ‘साइबर क्राइम’ का देश में सबसे ख़तरनाक पक्ष सामने आया है। पिछले वर्ष सैकड़ों मुसलमान स्त्रियों की तस्वीर बिना उनकी मर्जी के ‘गिट-हब’ नामक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर ‘बुली बाई’ नाम का ऐप बनाकर उसपर ‘वर्चुअल नीलामी’ के लिए डाल दिया गया था। इस मामले में एक शिकायत पर दिल्ली पुलिस ने एफ़आईआर दर्ज किया, उसके साथ ही मुंबई पुलिस ने मुंबई में दर्ज एक एफ़आईआर के आधार पर बेंगलुरु के 21 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र विशाल ओझा और उत्तराखंड की 18 वर्षीय इंजीनियरिंग में प्रवेश की इच्छुक छात्रा श्वेता सिंह को गिरफ़्तार किया है। इसी मामले में दो और भी गिरफ्तारियां हुई है। गिरफ़्तार अन्य दो युवकों की उम्र 20 और 21 साल है। वहीं सुल्ली डील्स के मामले में मध्यप्रदेश के इंदौर शहर से गिरफ़्तार ओम्कारेश्वर ठाकुर की उम्र 26 वर्ष है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बुली बाई – सुल्ली डील्स ऐप के मामले में गिरफ़्तार सभी आरोपी औसत मध्यमवर्गीय परिवारों से आते हैं। गिरफ़्तार सभी आरोपी के खिलाफ़ दर्ज मामलों की जांच की जायेगी और कानून अपना कार्य करेगा। लेकिन जिस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करने की आवश्यकता है, वह यह है कि बुली बाई ऐप के मामले में गिरफ़्तार चारों आरोपियों के पास लैपटॉप, इंटरनेट और स्मार्टफोन की उपलब्धता थी और परिवार के किसी भी सदस्य को इस बात की जानकारी नहीं थी कि वह इसका उपयोग किस प्रकार की गतिविधियों के लिए कर रहे हैं।
आरोपियों के परिवार के सदस्यों को उनके बच्चों की गिरफ़्तारी पर गहरा सदमा लगा है तथा उन्होंने अपने बच्चों की गिरफ़्तारी पर गुस्सा भी जाहिर किया है। उनका दावा है कि उनका बच्चा निर्दोष है, साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि उनका बच्चा लैपटॉप या इंटरनेट पर क्या कर रहा था यह उन्हें नहीं मालूम था। यदि हमें यह सुनिश्चित करना है कि अधिक से अधिक युवाओं का इंटरनेट पर किसी भी प्रकार की अवैध गतिविधियों में संलिप्तता ना हो तो हमें इस ख़ामियों को संबोधित करना होगा और माता-पिता को इस बहाने से बचना होगा कि उन्हें नहीं पता था कि उनका बच्चा इंटरनेट पर किन गतिविधियों में शामिल था।
बुली बाई ऐप के मामले में कथित मास्टरमाइंड नीरज बिश्नोई के पिता ने मीडिया को बताया कि उनका बेटा अपना ज्यादातर समय लैपटॉप पर बिताता था मगर वह अपराधी नहीं है और संभवतः वह इस तरह का अपराध नहीं कर सकता जिस तरह का आरोप उस पर लगाया गया है। गिरफ़्तार सभी आरोपी आपराधिक गतिविधियों में शामिल थे या नहीं यह न्यायालय तय करेगी, लेकिन तथ्य यही है कि पुलिस ने इन सभी की पहचान ऐप को बनाने वालों के रूप में किया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ बिश्नोई जिस लैपटॉप का इस्तेमाल कर रहा था, वह असल में उसे राज्य सरकार ने एक उत्कृष्ट छात्र होने के इनाम के तौर पर दिया था। नीरज ने 10वीं की परीक्षा में 86 प्रतिशत और 12वीं की परीक्षा में 82 प्रतिशत अंक हासिल किया था। इसी तरह, अन्य सभी गिरफ़्तार आरोपी के परिवारों ने दावा किया है कि उनका बच्चा निर्दोष है। हालांकि बुली बाई ऐप के मामले में गिरफ़्तार तीनों आरोपियों के परिवारों ने कथित तौर पर कहा है कि आरोपी लैपटॉप और इंटरनेट पर काफी समय बिताता था और उन्हें नहीं पता कि वे ऑनलाइन क्या करते थे।
बच्चों की बढती ऑनलाइन गतिविधि और उस पर नियंत्रण ना कर पाने के कारण बढ़ते अपराध का मुद्दा एक ऐसा मुद्दा है जो देश भर के अधिकांश परिवारों को चिंतित कर रहा है। माता-पिता अपने बच्चों के इंटरनेट और ऑनलाइन गतिविधियों पर एक समय से अधिक नज़र रखने में सक्षम नहीं हैं। अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों की 14 से 15 वर्ष की आयु तक ही उनकी ऑनलाइन गतिविधियों पर नज़र रखने में सक्षम होते हैं, उसके बाद माता-पिता की ओर से ढिलाई बरत दी जाती है या बच्चे अपनी ऑनलाइन गतिविधियों को छिपाने में अधिक कुशल हो जाते हैं।
यह संभव और उचित भी नहीं है कि बालिग बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर माता-पिता द्वारा नज़र रखी जाए या उनकी ऑनलाइन गतिविधियों को अभिभावकों द्वारा नियंत्रित किया जाए। लेकिन बुली बाई और सुल्ली डील्स ऐप जैसी आपराधिक मामले ख़तरनाक स्थिति की ओर संकेत करते हैं। इस तरह की आपराधिक प्रवृति बच्चों में अचनाक नहीं आती और ना तो ऐसी प्रवृति को अचानक से रोका जा सकता है। अगर बच्चों के कम उम्र के साथ शुरुआत से उनकी ऑनलाइन गतिविधियों पर नज़र रखी जाए और उन्हें ज्यादा समय स्क्रीन पर बिताने को लेकर होने वाले दुष्परिणामों के बारे में और इंटरनेट पर वैध-अवैध सामग्री के बारे में माता-पिता द्वारा जागरूक किया जाए तो इस तरह की आपराधिक प्रवृति को कम किया जा सकता है या फिर इसे रोका भी जा सकता है।
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने 2021 में देश के छह राज्यों के स्कूली बच्चों का एक सर्वेक्षण किया था, जिसमें पाया गया कि 8 से 17 वर्ष के बीच के 42.9 प्रतिशत बच्चों के पास अपने सोशल मीडिया अकाउंट हैं। जिसमें 37 फ़ीसदी बच्चों के पास फेसबुक और 45.50 फ़ीसदी के पास स्वयं का इन्स्टाग्राम अकाउंट है। जिन 10 वर्षीय बच्चों को सर्वेक्षण में शामिल किया गया था उनमें से 38 फ़ीसदी के पास फेसबुक अकाउंट थे। गौरतलब हो कि फेसबुक अकाउंट खोलने की न्यूनतम उम्र 13 साल है। सर्वेक्षण में शामिल 10 वर्षीय बच्चों में से 24 फ़ीसदी बच्चों के पास उनका अपना इन्स्टाग्राम अकाउंट है। 52.8 प्रतिशत बच्चे चैटिंग के लिए फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं। वहीं 8 से 17 वर्ष के बच्चों में 30 प्रतिशत बच्चों के पास अलग-अलग स्मार्टफोन हैं। लगभग 70 प्रतिशत बच्चे सोने से पहले स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं । यह तथ्य हमें भयावह स्थिति की ओर संकेत कर रहे हैं।
सऊदी अरब में परिवारों के डिजिटल व्यवहार को लेकर हुए एक अध्ययन के मुताबिक 49 प्रतिशत माता-पिता अपने बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए पैरेंटल नियंत्रण ऐप का उपयोग करते हैं। प्रश्न उठता है कि भारत जैसे देश में माता-पिता अपने बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नज़र कैसे रख सकते हैं, तो इसके लिए माता-पिता को यह सुनिश्चित करना होगा कि पैरेंटल नियंत्रण ऐप की सुविधा हर समय घर में मौजूद सभी डिवाइसों पर सक्रिय है। इंटरनेट ब्राउज़र के हिस्ट्री पर माता-पिता द्वारा नज़र रखनी होगी, इसके साथ ही बच्चों द्वारा स्क्रीन पर बिताने वाले समय को कम कर उन्हें अन्य रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना होगा।
14 से 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों तक स्मार्टफोन या अन्य विशिष्ट उपकरण की पहुँच को सीमित करना होगा। बच्चों को ऑनलाइन गेमिंग और शॉपिंग के ख़तरनाक पक्षों से परिचित कराना होगा, इसके साथ ही ऑनलाइन गेमिंग, शॉपिंग, इंटरनेट, सोशल मीडिया आदि के ज्यादा उपयोग करने के दुष्परिणामों के बारे में जागरूक करना होगा। यदि माता-पिता को किसी भी उपकरण पर कोई संदिग्ध गतिविधि मिलती है, तो उन्हें अपने बच्चों से विश्वास के साथ बात करने की जरूरत है। इसके साथ ही संभव हो तो विशेषज्ञ की भी सलाह ली जा सकती है। बच्चों की सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पहुंच सीमित करने के साथ-साथ उनके द्वारा की जाने वाली गतिविधियां माता-पिता की निगरानी में होनी चाहिए। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर बच्चों द्वारा साझा की जा रही फ़ोटो, वीडियो आदि जैसी सामग्रियों पर कड़ी नज़र रखने की जरुरत है। सही समय पर अगर बच्चों को उचित मार्गदर्शन, परामर्श और शिक्षा के साथ सामाजिक सरोकार की गतिविधियों से जोड़ा जाए तो बढ़ते उम्र में उनमें पनपने वाली आपराधिक प्रवृतियों में अंकुश लगाया जाना संभव हो सकता है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)