इस स्पीच में जो भी इमोशंस दिखाए गए हैं, वह अनुभव की उपज नहीं बल्कि ड्रामे की स्क्रिप्ट जैसा है. इसका सार संदेश यह बताया गया है कि पूरे विपक्ष को राहुल गांधी के पीछे लामबंद होना पड़ेगा. राजनीति के पुराने हथियार अब काम नहीं आएंगे. राहुल गांधी के नए हथियार से ही बीजेपी का मुकाबला किया जा सकेगा.
राहुल गांधी खुद को नीलकंठ बता रहे हैं. विपक्ष की आलोचनाओं का स्वागत कर रहे हैं. राजनीति को जहर मानने वाले राहुल गांधी अब जहर पीने लगे हैं. एआई मिनिस्टर, एआई एंकर, अब तो आम बात हो गई है. राजनीति जरूर खुद के अनुभव इमोशंस से ही अब तक चलती रही है.
राहुल गांधी की राजनीति रोबोट पॉलिटिक्स का नमूना है. रोबोट वही क्रिया करता है, जो उसमें प्रोग्राम होता है. प्रोग्राम करने वाला सामने नहीं होता, लेकिन रोबोट उतना ही चलेगा जितना इसमें चाबी भरी गई है. राहुल गांधी की राजनीति और मुद्दों में निरंतरता शायद इसीलिए नहीं है, कि उन्हें समय-समय पर नई स्क्रिप्ट और प्रोग्राम थमाए जाते हैं. अब उन्हें प्रतिरोध की राजनीति की स्क्रिप्ट मिली है.
अभी कुछ दिन पहले ही उनकी स्क्रिप्ट यह थी कि देश में आर्थिक सुनामी आने वाली है. पीएम मोदी के खिलाफ़ सिस्टम में इंस्टीट्यूशनल विद्रोह हो रहा है. इलेक्शन कमीशन, खुफिया तंत्र और ज्यूडिशरी के सीनियर लेवल से उन्हें मैसेज मिल रहे हैं. अब इंडिया ब्लॉक की बैठक में उनकी स्क्रिप्ट बदल गई है. वह कह रहे हैं, भाजपा और संघ ने इलेक्शन कमिशन ज्यूडिशियरी, यूनिवर्सिटी और लगभग सभी इंस्टिट्यूशन्स पर कब्जा कर लिया है. देश में चुनाव का लेवल प्लेइंग फील्ड नहीं है.
अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, वामपंथी और तेजस्वी यादव को संबोधित करते हुए राहुल गांधी कहते हैं कि अभी भी यह नेता उनका चुनाव हंड्रेड परसेंट चुराया जाना नहीं मानते हैं. जिस राजनीति और तरीकों से अब तक चुनाव जीता जाता रहा है वह अब नहीं हो पाएगा, क्योंकि चुनाव चुराए जा रहे हैं. लेवल प्लेइंग फील्ड नहीं है. विपक्षी नेताओं की आलोचना का जहर पीने वाले राहुल गांधी अब प्रतिरोध को ही राजनीति को नया हथियार बता रहे हैं.
कांग्रेस को प्रतिरोध की पार्टी बता रहे हैं. निश्चित रूप से उनका आशय कांग्रेस द्वारा लड़ी गई आजादी की लड़ाई से होगा. आजादी की लड़ाई में सत्य और अहिंसा का मंत्र अंग्रेजों के खिलाफ था. लड़ाई आजादी के लिए थी, लेकिन इस प्रतिरोध के हथियार को अब राहुल गांधी भारतीय व्यवस्था और भारत की सरकार के खिलाफ़ उपयोग करनेका ऐलान कर रहे हैं.
यह सत्य राहुल गांधी से छूट गया है कि जिस कांग्रेस का कुछ भी योगदान आजादी की लड़ाई में था, वह कांग्रेस कबके समाप्त हो गई है. वह कांग्रेस कितनी बार टूट चुकी है, कितनी बार कांग्रेस के चुनाव चिन्ह बदल चुके हैं. अब राहुल गांधी जिस कांग्रेस का नेतृत्व कर रहे हैं वह पुरानी कांग्रेस अब बची ही नहीं है.
अब तो उनके मुद्दे उन्हें ही झूठे साबित कर रहे हैं. चुनावी प्रक्रिया उन राज्यों में सत्य पर आधारित है, जहां कांग्रेस पार्टी या उसके सहयोगियों की जीत होती है. कांग्रेस का सत्य यह है कि उसे मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन में कोई बुराई नहीं दिखती है. मुस्लिम लीग के विचार कांग्रेस को कम्युनल नहीं दिखाई पड़ते.
राहुल गांधी का सत्य सत्ता है. तमिलनाडु में जिस तरह से डीएमके के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा गया, उसकी पराजय के बाद टीवीके के साथ जाकर कांग्रेस द्वारा सरकार में शामिल हो जाना, कांग्रेस के लिए सत्य और करुणा का उदाहरण है. डीएमके अगर कांग्रेस को धोखेबाज और छुरा भोंकने वाला बता रही है, तो यह उनका सत्य हो सकता है लेकिन कांग्रेस के लिए यह असत्य है.
भगवान शिव ने संसार को बचाने के लिए विष पान किया था, लेकिन डीएमके सवाल उठा रही है कि इंडिया ब्लॉक में यह विष उत्पन्न करने के लिए कौन जिम्मेदार है.
राहुल गांधी का प्रतिरोध मोड भी रोबोट पॉलिटिक्स से ज्यादा नहीं है. कॉकरोच जनता पार्टी भी युवाओं के बीच प्रतिरोध की राजनीति ही कर रही है. एक तरफ युवा नीट की परीक्षा के लिए तैयारी कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ राहुल गांधी कोटा में युवाओं के साथ संवाद करने पहुंच रहे हैं. जहां भी संभावनाएं हैं वहां तो युवाओं से संवाद का अपना आंदोलन चला रहे हैं.
यह प्रतिरोध नया नहीं है. पहले भी छात्र-छात्राओं के साथ राहुल गांधी ने संवाद करते रहे हैं. उसके जरिए सत्ता तक पहुंचने का उनका लक्ष्य अब तक तो पूरा नहीं हुआ है. जब तक राजनीति रोबोट जैसा होती रहेगी उसमें कोई इमोशन, अनुभव, परिश्रम नहीं होगा, तब तक कोई भी राजनीति का अभियान लोगों को प्रभावित नहीं करेगा. कांग्रेस जन भावनाओं से कनेक्ट ही नहीं कर पाती है. उसमें अनुभव की आत्मा दिखाई नहीं पड़ती है.
प्रतिरोध की राजनीति विपक्ष की प्राथमिक जिम्मेदारी है. अब तक अगर इसको नहीं किया जा रहा था, तो यह भी राहुल गांधी और कांग्रेस की ही गलती है. बिना जिम्मेदारी के पावर का इंजॉय राहुल गांधी की स्टाइल है. राज्यों की सत्ता में कांग्रेस नेताओं को संतुष्ट करने के लिए ढाई-ढाई साल का सीएम बनाने का फॉर्मूला संविधान का नहीं राहुल गांधी का सत्य है. इसी सत्य के लिए वह लड़ रहे हैं.
गामा पहलवान बनना है, तो अखाड़े में पसीना बहाना पड़ेगा. एसी में बैठकर स्क्रिप्ट पढ़ देने से ड्रामा तो हो सकता है, लेकिन इससे कोई गामा नहीं बन सकता.
जो राजनीति को जहर माने फिर भी इस प्रोफेशन में दिन-रात गुजारी तो फिर उसकी शक्ति की अनुभूति पर ही सवालिया निशान है. पॉलिटिकल रोबोट का प्रतिरोध मोड मजाक ही साबित होगा.