चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को गणगौर उत्सव मनाया जाता है। इसे ईसर-गौर भी कहते हैं। ईसर यानी भगवान शिव और गौर यानी देवी पार्वती। इस पर्व में शिव-पार्वती की पूजा ही विशेष रूप से की जाती है। गणगौर तीज कुंवारी और विवाहित महिलाएं अपने सौभाग्य और अच्छे वर की कामना करने के लिए करती हैं। इस दिन माता पार्वती और भगवान शंकर की आराधना की जाती है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता गवरजा यानि मां पार्वती होली के दूसरे दिन अपने पीहर आती हैं और आठ दिनों के बाद इसर जी यानि भगवान शिव उन्हें वापस लेने के लिए आते हैं। इसलिए यह त्योहार होली की प्रतिपदा से आरंभ होता है।
इस दिन से सुहागिन स्त्रियां और कुंवारी कन्याएं मिट्टी के शिव जी यानि गण एवं माता पार्वती यानि गौर बनाकर उनका प्रतिदिन पूजन करती हैं। इसके बाद चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर यानि शिव पार्वती की विदाई की जाती है। जिसे गणगौर तीज कहा जाता है।
पूजन विधि
गणगौर पूजा वाले दिन स्नान के पश्चात स्त्रियां सोलह श्रृंगार कर पूजन शुरू करें। मिट्टी के शिव और गौरी को सुंदर वस्त्र पहनाएं। अब देवी पार्वती को सुहाग की सामग्री (16 श्रृंगार का सामान) अर्पित करें। सौभाग्य की कामना लिए दीवार पर सोलह -सोलह बिंदियां रोली,मेहंदी और काजल की लगाएं। भगवान शंकर और माता पार्वती को चंदन, अक्षत, रोली, सिंदूर, धूप, दीप, फल, मिठाई अर्पित करें। एक थाल में चांदी का सिक्का, सुपारी, पान, दूध, दही, गंगाजल, हल्दी, कुमकुम, दूर्वा डालकर सुहाग जल तैयार करें। दोनों हाथों में ताजी दूब लेकर इस सुहाग जल को भगवान शिव और देवी गौरी पर छींटें लगाएं और फिर सुहागिनें अपने ऊपर सुहाग के प्रतीक के रूप में खुद पर जल छिड़कें। माता पार्वती को जो सिंदूर चढ़ाया है अब स्त्रियां उसे मांग में भरें, मान्यता है इससे सुहाग की आयु लंबी होती है। गणगौर पूजा में जो प्रसाद चढ़ाएं उसे सिर्फ महिलाएं ही ग्रहण करें. अगले दिन इन मूर्तियों का विसर्जन किया जाता है।