भोपाल: भारत के सबसे चर्चित वन्यजीव संरक्षण प्रोजेक्ट 'कूनो नेशनल पार्क' में इन दिनों एक अलग तरह की कश्मकश देखने को मिल रही है। नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाए गए चीतों के पुनर्वास को जहां वैश्विक स्तर पर सुर्खियां मिलीं, वहीं इस चकाचौंध के पीछे देश का एक और बेहद महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट 'लॉयन्स इन वेटिंग' दम तोड़ता नजर आ रहा है। यह मामला गुजरात के गिर से एशियाई शेरों को मध्य प्रदेश के कूनो में शिफ्ट करने का है, जो सालों से अधर में लटका है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी?

गौरतलब है कि साल 2013 में ही देश की शीर्ष अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए गिर के शेरों को कूनो नेशनल पार्क भेजने का आदेश दिया था। इसके पीछे मुख्य वैज्ञानिक तर्क यह था कि किसी महामारी या आपदा की स्थिति में शेरों की पूरी प्रजाति को विलुप्त होने से बचाने के लिए एक दूसरा सुरक्षित आशियाना बेहद जरूरी है। कूनो को शेरों के अनुकूल मानकर दशकों तक वहां तैयारी की गई और स्थानीय गांवों को विस्थापित भी किया गया, लेकिन गुजरात सरकार की अनिच्छा के कारण यह स्थानांतरण कभी जमीन पर नहीं उतर सका।

चीतों की एंट्री ने बदला पूरा खेल

विशेषज्ञों का मानना है कि कूनो में अचानक 'प्रोजेक्ट चीता' की एंट्री ने शेरों के दावों को पूरी तरह से बैकसीट पर धकेल दिया है। एक ही नेशनल पार्क में चीतों और शेरों जैसे दो बड़े शिकारियों का एक साथ सह-अस्तित्व वैज्ञानिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है। ऐसे में कूनो की धरती अब एक बड़े पर्यावरण-राजनीतिक दंगल का केंद्र बन चुकी है, जहां विदेशी चीतों की सफलता को साबित करने के दबाव में देश के अपने एशियाई शेरों का इंतजार लंबा होता जा रहा है।

दोनों का एक साथ रहना है मुश्किल?

पारिस्थितिक तंत्र के नियम के अनुसार, शेर एक शीर्ष शिकारी है। यदि कूनो में गिर के शेरों को छोड़ा जाता है, तो वे वहां के विशाल क्षेत्र पर अपना दबदबा कायम कर लेंगे। चीते स्वभाव से शेरों की तुलना में कमजोर होते हैं और उनके शावकों को शेरों और तेंदुओं से सबसे ज्यादा खतरा होता है। वर्तमान में पूरा ध्यान चीतों को बचाने पर केंद्रित है, इसलिए प्रशासनिक अधिकारी जानबूझकर शेरों की एंट्री को टाल रहे हैं, भले ही यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना ही क्यों न हो।