एक पति अपनी एक पत्नी से कहता है- 'तुमने मुझे पूर्ण बना दिया' तुम्हारे बिना मैं अधूरा था। ऐसा नाटकों में अक्सर देखा और कहा जाता है, लेकिन असली जिंदगी में इसकी उम्मीद न करें। यह कितना भी रोमांटिक क्यों न लगे लेकिन सच तो यह है कि पति-पत्नी को एक दूसरे को पूर्ण नहीं बनाना होता है, उन्हें एक-दूसरे का ऐसा पूरक बनना होता है, जो कमियों का पता ही न चलने दें। 
पूर्ण बनाने की उम्मीद, किसी भी ओर से हो, दूसरे इंसान को अजीब-सी जिम्मेदारी के जंजाल में फंसा देती है। इसी के चलते दाम्पत्य जीवन असुरक्षित हो जाता है। यहीं से अपरिपक्व व्यवहार की भी शुरुआत हो जाती है पति या पत्नी, दोनों में से कोई भी अगर अपनी खुशी का जिम्मा दूसरे के ऊपर डाल दे, तो भी रिश्ता असुरक्षित हो जाता है। 
इससे दो बातें साफ़ होती हैं- आप अपनी खुशी के लिए दूसरे के ऊपर निर्भर नहीं रह सकते, और दूसरी कि जिसके सिर पर खुशी जुटाने का बोझ है, वो भी परेशान हो जाता है।
मिज़ाज अलग क्यों हैं?
स्त्री और पुरुष अलग ढंग की परवरिश पाते हैं। ऐसा केवल हमारे देश में नहीं है, पूरी दुनिया के अभिभावक अपने बच्चों से अलग-अलग ढंग से संवाद करते हैं। बच्चियों से संवाद करते हुए 'ज्यादा भावनात्मक, परवाह-भरे, धीमी 'आवाज वाले सौम्य शब्दों' का उपयोग किया जाता है, वहीं बालकों से बात करते हुए 'तर्क, अनिवार्यता और ताकत वाले लहजे में ऐसे ही शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है।
इसलिए यह निष्कर्ष निकालना कि पुरुष ज्यादा तर्कसम्मत बातें करते हैं या महिलाएं पैदायशी भावुक होती हैं या भावाभिव्यक्ति में बेहतर होती हैं, दरअसल ये एक शाश्वत सत्य नहीं है। इसके पीछे मानवनिर्मित कारण भई हैं।