भोपाल: राज्य सरकार ने वनवासियों के वोट प्रभावित करने की मंशा से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के माध्यम से यह घोषणा करवाई कि जंगलों का प्रबंधन समुदायिक वन कमेटी करेगी. यानि केंद्रीय गृह मंत्री ने बड़े ही गर्व के साथ कहा था कि मध्यप्रदेश पहला राज्य है जिसने वनों का मालिकाना हक आदिवासियों को दिया है.
केंद्रीय गृह मंत्री शाह के घोषणा के 7 दिन बाद ही उस आदेश को ही वन विभाग ने निरस्त कर दिया, जिसकी पृष्ठभूमि के तहत शाह ने घोषणा की थी. केंद्रीय मंत्री शाह ने जिस नए संकल्प के जरिए 22 अप्रैल को भले ही घोषणा कर थी किंतु उसे निरस्त करने का फैसला सरकार ने 8 अप्रैल को ही ले लिया था.
राज्य सरकार संकल्प को निरस्त करने के फैसले से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को अवगत नहीं करा सकी. इसकी वजह भी साफ थी. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का दौरा कार्यक्रम फाइनल हो गया था. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जंबूरी में आयोजित तेंदूपत्ता सम्मेलन को निरस्त नहीं कराना चाहते थे.
सूत्रों की माने तो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के भोपाल कार्यक्रम में तेंदूपत्ता सम्मेलन का आयोजन अंतिम समय में जोड़ा गया. शायद यही वजह रही कि प्रमुख सचिव वन अशोक वर्णवाल और उनकी टीम ने मंथन और चिंतन किए बिना ही वनों का प्रबंधन ग्राम सभा द्वारा गठित सामुदायिक वन प्रबंधन समितियों के हवाले करने का संकल्प तैयार कर लिया. जबकि यह संकल्प वन अधिकार अधिनियम 2005 प्रावधानों के अंतर्गत नहीं था.
तीर फाउंडेशन नागपुर और माधुरी ने किया था विरोध-
वन विभाग द्वारा 11 मार्च को जारी संकल्प को लेकर मुख्यमंत्री सचिवालय और वन विभाग के अफसरों के बीच कई दौर की बैठकें हुई. बैठकों के बाद नए संकल्प को अंतिम रूप दिया गया. इस बीच तीर ( ट्राईबल एथोस एंड इकोनॉमिक रिसर्च) फाउंडेशन के निदेशक मिलिंद थट्टे और अतिक्रमणकारियों की वकालत करने वाली माधुरी वेन ने इसका विरोध किया.
तीर फाउंडेशन ने तो अपने विरोध के संबंध में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के समक्ष अपना प्रेजेंटेशन भी दिया. अपने प्रेजेंटेशन में पीर फाउंडेशन ने बताया कि सामुदायिक वन प्रबंधन कमेटी बनाने का निर्णय एक नौकरशाही निर्णय के अलावा कुछ नहीं है. यह संकल्प केवल पंचायती राज अधिनियम की बात करती है लेकिन वन अधिकार अधिनियम के विपरीत है.
तीर फाउंडेशन के प्रेजेंटेशन का मुख्यमंत्री सचिवालय में लक्ष्मण सिंह मरकाम का भी समर्थन मिला. इस मुद्दे पर प्रमुख सचिव वन अशोक वर्णवाल और लक्ष्मण सिंह मरकाम के बीच बहस भी हो गई थी. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 8 तारीख को फैसला ले लिया था कि वन प्रबंधन के अधिकार सामुदायिक समितियों संबंधित संकल्प को निरस्त किया जाएगा.
यही कारण है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की घोषणा के सात दिन के भीतर ही 11 मार्च के नए संकल्प को निरस्त कर दिया गया.
तीर फाउंडेशन प्रेजेंटेशन के प्रमुख अंश-
- 2006 में संसद में वन अधिकार अधिनियम (FRA) पारित करने के बाद 1988 की वन नीति और मप्र वन नीति 2005 में जो भी अधिनियम से अलग कहा गया है वह सब निरस्त हो गया है.
- नए संकल्प की प्रस्तावना में वन अधिकार कानून (FRA) का उल्लेख भी न करना यह गलत है.
- संयुक्त वन प्रबंधन समिति (JFMC) को कोई अधिकारिता किसी कानून ने नहीं दी थी उसी का नाम बदलकर सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समिति (सीएफआरएमसी) कहने से चरित्र नहीं बदलता.
- एक ही काम ग्राम स्तर पर दो समितियों को नहीं दिया जा सकता.
- वन अधिकार प्राप्त सीएफआरएमसी वन अधिकार धारको या ग्राम सभा के सदस्यों से बनती है इसमें वन अधिकारी सचिव नहीं बन सकते.
- विकास खाता में वन विभाग का सचिव है. इसमें ज्यादा पैसा आएगा और इस पर ग्राम सभा का कोई नियंत्रण नहीं है