आयोग ने कहा है कि इस मामले में थाना प्रभारी शैलेंद्र सक्सेना का 17 सितंबर 2020 को पुलिस कर्मचारियों का प्रेमनगर ग्राम में आवेदक सुरेश घोष व मनोहर घोष के साथ झगड़ा होने व अनुसंधान के बाद शीघ्र गिरफ्तारी पंचनामा नहीं बनाने, अभिरक्षा में चोटिल होने के बाद एमएलमी नहीं करवाने एवं उपेक्षा के कारण आवेदकों के स्वास्थ्य सुरक्षा, जीवन के जीने के अधिकार तथा गरिमा के अधिकार का हनन किया गया है। इसलिए अपने पदीय कर्तव्यों से इतर व्यवहार (उपेक्षापूर्ण कार्यवाहियों) के दोषी पाए गए सभी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाए। आयोग से मिली जानकारी के अनुसार, मामला 2020 का है।
आयोग ने अपनी अनुशंसा में शासन से यह भी कहा है कि थाना स्तर के पुलिस कर्मचारी, कर्मचारियों की शिकायत पर शासकीय ड्यूटी में हस्तक्षेप व उनकी मारपीट की घटना के संबंध में यदि आपराधिक प्रकरण उन्हीं कर्मचारियों की स्थापना के थाने में पंजीबद्ध किया जाता है तो उस आपराधिक प्रकरण की विवेचना, अनुविभागीय अधिकारी का उप पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारी से कराए जाने के दिशा-निर्देश जारी किए जाए। किसी भी व्यक्ति को अभिरक्षा में लेने और उसकी गिरफ्तारी करने की स्थिति में दंड प्रक्रिया संहिता 1973 का अक्षरसः पालन सुनिश्चित किया जाए। इसके साथ ही प्रधान आरक्षक रामकिशोर सैन, वरिष्ठ आरक्षण मनीष भदौरिया व आरक्षक विजय वर्मा को अगले पांच वर्ष तक किसी भी थाने में पदस्थ न किया जाए।
टीकमगढ़ जिले के ग्राम देवखा थाना दिगौड़ निवासी आवेदक सुरेश पीप ने पुलिस द्वारा उसके मानव अधिकारों का हनन करने के विरूद्ध आयोग को एक लिखित आवेदन प्रस्तुत किया गया था।