अब तक कांग्रेस की सरकारों ने भी उसका रजिस्ट्रेशन नहीं मांगा. अब कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पुत्र कर्नाटक में गृहमंत्री प्रियांक खड्गे आरएसएस से उसका रजिस्ट्रेशन लीगलिटी और फंडिंग की जानकारी मांग रहे हैं. प्रियांक खड्गे यह भी कह रहे हैं, कि यह जानकारी नहीं मिली तो संघ को कर्नाटक में प्रतिबंधित कर दिया जाएगा. इसके लिए कानून लाने की तैयारी चल रही है.
पंडित जवाहरलाल नेहरु और इंदिरा गांधी के समय भी संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था. कांग्रेस हमेशा महात्मा गांधी की हत्या से संघ की विचारधारा को जोड़ती है. कानूनी रूप से यह स्थापित हो चुका है, कि गांधी जी की हत्या में संघ की कोई भूमिका नहीं थी. फिर भी कांग्रेस इसका राजनीति में अब तक उपयोग करती आ रही है.
कांग्रेस अपने नेताओं इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की हत्या करने वालों के साथ करुणा दिखाती है, लेकिन क्योंकि राजनीति में महात्मा गांधी के नाम से लाभ हो सकता है इसलिए उसको हमेशा जीवित रखने की कोशिश करती है.
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अब कांग्रेस की राजनीति के लिए मजबूरी बन गया है. कांग्रेस राजनीति की जिस दिशा में आगे बढ़ गई है, जो मुस्लिमलीगी लाइन पकड़ ली है, उस जोड़ को मजबूत करने के लिए उसे संघ पर हमले लगातार करते रहना ही पड़ेगा. कांग्रेस में जो भी नेता राहुल गांधी की करीबी चाहता है, वह संघ के खिलाफ़ नए-नए विचार प्रकट करता है.
हर कांग्रेसी यह जानता है, कि राहुल गांधी संघ की खिलाफ़त को कांग्रेस की विचारधारा मानते हैं. कांग्रेस कभी भी इस बात का आंकलन नहीं करती कि इन सौ सालों में साथ-साथ चलते हुए कांग्रेस और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ देश में किस मुकाम पर पहुंच गए हैं.
संघ के संस्कारित और दीक्षित प्रचारक आज केंद्र में प्रधानमंत्री के रूप में देश की व्यवस्था संचालित कर रहे हैं. 22 राज्यों में भले ही संघ के प्रचारक मुख्यमंत्री नहीं हैं, लेकिन बीजेपी का कोई भी मुख्यमंत्री संघ की विचारधारा के खिलाफ बोलने या कुछ भी करने का साहस नहीं कर सकता है.
संघ विरोधी कांग्रेस के स्टैंड से इतना तो निश्चित है, कि संघ कांग्रेस की चिंता का बड़ा कारण है. चिंता चिता समान है. चिता तो निर्जीव शरीर को मारती है, लेकिन चिंता जीवित व्यक्ति या संस्था को नष्ट कर देती है.
राहुल गांधी कहते हैं कि वह संघ से लड़ाई लड़ते रहेंगे. यह लड़ाई क्या और किस बात की है, यह देश को आज तक समझ नहीं आया. कांग्रेस के अनुभवी और परिपक्व नेता राजनीतिक रूप से संघ के समर्थक नहीं होते थे, लेकिन वैचारिक रूप से संघ के समर्थन में ना केवल सोचते थे बल्कि समय आने पर साथ भी दिखाई पड़ते थे.
प्रणव मुखर्जी कांग्रेस के विचारशील नेता थे. वह संघ के मुख्यालय पर अतिथि बनकर जाते हैं तो निश्चित रूप से संघ की विचारधारा के प्रति अपना दृष्टिकोण बताते हैं. संघ राजनीति में नहीं है. यह अलग बात है कि संघ की विचारधारा राजनीति में चारों तरफ अपना प्रभुत्व दिखा रही है.
कांग्रेस तो ऐसा मानती है, कि भाजपा की सरकारों, देश की संवैधानिक संस्थाओं और ज्यूडीशियरी पर संघ का कब्जा हो गया है. नीट पेपर लीक में भी कांग्रेस संघ की भूमिका देखती है. एनटीए के अध्यक्ष को संघ का व्यक्ति मानती है.
मध्य प्रदेश में मीनाक्षी नटराजन का राज्यसभा नामांकन निरस्त होने के पीछे भी कांग्रेस संघ को आरोपित करती है. कांग्रेस रिटर्निंग ऑफिसर की पृष्ठभूमि को संघ से जोड़ती है. कम से कम विचार के मामले में तो देश में स्वतंत्रता है. कोई किसी पद पर है, तो वह वैचारिक रूप से किसी का गुलाम नहीं हो सकता. हर व्यक्ति को अपना विचार रखने की पूरी स्वतंत्रता है.
संघ कोई प्रतिबंधित संगठन नहीं है. अब तो संघ में शासकीय कर्मचारियों अधिकारियों को भी जाने की अनुमति है. संघ की गतिविधियां खुले में सार्वजनिक होती हैं. अगर कोई विचार के स्तर पर संघ से सहमत है तो क्या इसका मतलब है कि वह संघ का स्वयंसेवक हो गया.
कांग्रेस संघ को कोसते-कोसते खुद किनारे लगती जा रही है. फिर भी उसे सोचने की फुर्सत नहीं है. ऐसा लगता है संघ को लेकर कांग्रेस की चिंता उसके विवेक को ही नष्ट कर रही है. कांग्रेस के सामने तो उनके पुरखों का इतिहास है. उनके पुरखों ने भी संघ के बारे में वही सब कहा और किया जो आज राहुल गांधी और प्रियांक खड्गे कहने और करने की कोशिश कर रहे हैं.
खिलाफत आंदोलन किसी भी मुद्दे को प्रमुखता से स्थापित करने का जरिया बन जाता है. संघ तो अपना काम समर्पण और देशभक्ति के साथ कर ही रहा है, लेकिन उसके काम की खिलाफ़त करके कांग्रेस उसे व्यापकता देने में अपनी भूमिका निभा रही है.
भारतीय राजनीति में जो बदलाव आया है, वह इस बात का प्रमाण है, कि देश संघ के समर्पण और उसकी विचारधारा को ना केवल महसूस कर रहा है बल्कि उस पर चलने वाले राजनीतिक दल को भरपूर समर्थन भी कर रहा है. संघ सरकार से कोई मदद लेता नहीं है. संघ समाज का सांस्कृतिक संगठन है. उसकी फंडिंग समाज के सहयोग से ही है. संघ का कहना है, कि हिंदुस्तान में हिंदुत्व की विचारधारा में जन्मा, पला, बढ़ा हर व्यक्ति भारतीय है और उनको एकजुट करना उसका लक्ष्य है. सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों की विचारधारा के लिए संस्कार और समर्पण में किसी रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता नहीं है.
हिंदुस्तान में संघ और उसकी विचारधारा का विरोध अकारण ही एक बड़े समूह को नाराज कर देता है. जिस समूह को खुश करने के लिए कांग्रेस ऐसा करती है वह भी कांग्रेस से संतुष्ट है, ऐसा तो लग ही नहीं रहा है. संघ का प्रतिरोध कांग्रेस के लिए गतिरोध बन गया लगता है.
गुरुदक्षिणा आयकर से मुक्त है.संघ इसी पर अपनी गतिविधियों के संचालन का दावा करता है.