स्कूली बच्चों और अभिभावकों को जमकर लग रहा चूना
भोपाल: मध्यप्रदेश में ज्यादातर प्राइवेट स्कूलों में फीस, यूनिफार्म और किताबों के संबंध में जारी आधिकारिक गाइडलाइन का पालन नहीं किया जा रहा है। इस संबंध में स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से गठित समितियां भी कोई कदम नहीं उठा रहीं हैं। यहां तक कि समितियों द्वारा शिकायतों के बाद भी संबंधित स्कूलों का निरीक्षण तक नहीं किया गया है। यही वजह है कि प्राइवेट स्कूल बस्ते का बोझ कम करने के संबंध में जारी किसी भी गाइडलाइन का पालन नहीं कर रहे हैं। अधिकांश प्राइवेट स्कूल एनसीईआरटी की किताबों के स्थान पर प्राइवेट प्रकाशकों की किताबें खुल्लमखुल्ला चला रहे हैं। हाल ये है कि 250 रुपए का बुक सेट बच्चों को 5000 रुपए में मिल रहा है।
प्राइवेट स्कूलों में गाइडलाइन का पालन नहीं
भोपाल कलेक्टर ने 7 मार्च को इस संबंध में स्पष्ट आदेश जारी किया था। इसमें तीन साल के अंदर यूनिफार्म बदलने वाले स्कूलों के खिलाफ कार्यवाही के साथ ही निश्चित दुकान से किताब या यूनिफार्म खरीदने का दबाव नहीं डालने की बात भी कही गई थी। सभी प्राइवेट सीबीएसई कोर्सेस वाले स्कूलों को फीस, किताबों की सूची, यूनिफार्म, यातायात सुविधा आदि के बारे स्कूल के नोटिस बोर्ड पर जानकारी चस्पा करने को कहा गया था पर इसका पालन नहीं हो रहा। राजधानी ही नहीं, प्रदेशभर के स्कूलों के यही हाल हैं।
प्राइवेट स्कूल बार—बार किताबें बदल देते हैं। स्कूलों में हर क्लास की प्रायवेट पब्लिशर्स की किताबों को भी हर साल बदल देते हैं जिससे अभिभावक को मजबूरन बाजार से ही नई किताबें खरीदनी प़ड़ती है। सबसे बुरी बात तो यह है कि प्राइवेट स्कूलों में एनसीईआरटी की किताबें चलाने संबंधी नियम सख्ती से लागू नहीं होने से बेचारे अभिभावक लुट रहे हैं। ऐसे में एक क्लास का प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबों का बुक सेट कई गुना महंगा लेना पड़ रहा है। प्रायवेट पब्लिशर्स की एक भी किताब 150 रुपए से कम कीमत की नहीं है। एनसीईआरटी का 250 रुपए का बुक सेट प्राइवेट किताबों के कारण अभिभावकों को 5000 रुपए का पड़ रहा है। ऐसे में अभिभावक अलग दुकान से नोटबुक भी नहीं ले सकते हैं। प्राइमरी क्लासेस की नोटबुक के लिए कई स्कूली बच्चों के अभिभावकों को 3000 रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं।
पालक महासंघ के पदाधिकारियों के अनुसार सभी सीबीएसई स्कूलों में केवल एनसीईआरटी की किताबें ही पढ़ाने का नियम सख्ती से लागू होना चाहिए। इससे जहां बच्चों पर बस्तों का बोझ कम होगा वहीं अभिभावकों को भी महंगी किताबें नहीं खरीदनी होंगी जिससे उनपर भी दबाव कम होगा। इस आदेश को तत्काल लागू किया जाना चाहिए।