भारत में मानसून हमेशा से कृषि, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मौसम वैज्ञानिक एक ऐसे परिवर्तन को दर्ज कर रहे हैं जो भविष्य के लिए गंभीर संकेत देता है। यह परिवर्तन है- दक्षिण-पश्चिम मानसून और पश्चिमी विक्षोभों के बढ़ते इंटरैक्शन तथा जलवायु परिवर्तन के कारण उनकी बदलती प्रकृति।

पारंपरिक रूप से पश्चिमी विक्षोभ शीतकालीन मौसम प्रणालियां मानी जाती थीं, जो भूमध्यसागर क्षेत्र से उत्पन्न होकर उत्तर-पश्चिम भारत और हिमालयी क्षेत्रों में वर्षा तथा हिमपात कराती थीं। लेकिन अब वैज्ञानिक शोध बता रहे हैं कि ये प्रणालियां केवल सर्दियों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि गर्मियों और मानसून के दौरान भी अधिक सक्रिय दिखाई दे रही हैं। 

2025 और 2026 ने क्यों बढ़ाई चिंता?

वर्ष 2025 में मानसून काल के दौरान सामान्य से कहीं अधिक पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय

वर्ष 2025 में मानसून काल के दौरान सामान्य से कहीं अधिक पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय रहे। कई विक्षोभ लगातार 5 से 7 दिनों तक प्रभावी बने रहे और हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड में फ्लैश फ्लड, भूस्खलन और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाओं को बढ़ावा मिला। वैज्ञानिकों ने इसे एक असामान्य स्थिति माना, जिसका संबंध आर्कटिक और पश्चिम एशिया में बढ़ते तापमान से जोड़ा गया। 

इसी क्रम में 2026 में प्रकाशित IIT रुड़की के अध्ययन ने बताया कि पश्चिमी विक्षोभ अब प्री-मानसून और मानसून काल में पहले की तुलना में अधिक सक्रिय हो रहे हैं। उनका मार्ग, तीव्रता और नमी ग्रहण करने की क्षमता बदल रही है। 

ग्लोबल वार्मिंग क्या बदल रही है?

वैश्विक तापवृद्धि केवल पृथ्वी का तापमान नहीं बढ़ा रही, बल्कि पूरे वायुमंडलीय परिसंचरण तंत्र को प्रभावित कर रही है।

1. अरब सागर बन रहा है अधिक गर्म

अरब सागर का तापमान वैश्विक औसत से अधिक तेजी से बढ़ रहा है। गर्म समुद्र अधिक जलवाष्प उत्पन्न करता है। परिणामस्वरूप मानसून और पश्चिमी विक्षोभ दोनों को अतिरिक्त नमी उपलब्ध हो रही है। 

2. जेट स्ट्रीम का बदलता मार्ग पश्चिमी विक्षोभ उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट स्ट्रीम (Subtropical Westerly Jet) के साथ भारत तक पहुंचते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार आर्कटिक क्षेत्र के तेजी से गर्म होने के कारण जेट स्ट्रीम का मार्ग और संरचना बदल रही है। इससे पश्चिमी विक्षोभ अधिक दक्षिण या अधिक उत्तर की ओर विचरण कर रहे हैं तथा कई बार लंबे समय तक किसी क्षेत्र पर बने रहते हैं। 

3. वातावरण में बढ़ती नमी

भौतिक विज्ञान का सिद्धांत कहता है कि तापमान में प्रत्येक 1°C वृद्धि पर वातावरण लगभग 7% अधिक नमी धारण कर सकता है। इसलिए जब कोई सक्रिय मौसम प्रणाली बनती है, तो उससे होने वाली वर्षा अधिक तीव्र हो सकती है।

मानसून और पश्चिमी विक्षोभ का नया गठजोड़

मौसम वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी चिंता मानसून और पश्चिमी विक्षोभों के बढ़ते इंटरैक्शन को लेकर है।

जब बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से आई मानसूनी नमी उत्तर भारत तक पहुंचती है और उसी समय कोई पश्चिमी विक्षोभ हिमालयी क्षेत्र में सक्रिय होता है, तब दोनों प्रणालियां मिलकर अत्यधिक अस्थिर मौसम उत्पन्न कर सकती हैं। इस स्थिति में:

बादल तेजी से विकसित होते हैं,

कम समय में अत्यधिक वर्षा होती है,

बादल फटना, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन जैसी घटनाएं बढ़ जाती हैं। 

2013 की केदारनाथ आपदा से लेकर 2025 की हिमालयी बाढ़ों तक, अनेक घटनाओं में मानसूनी नमी और पश्चिमी विक्षोभ के संयुक्त प्रभाव की भूमिका सामने आई है।

दूसरी ओर एक विरोधाभास भी

रोचक तथ्य यह है कि सभी शोध एक जैसी तस्वीर नहीं दिखाते। कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि पश्चिमी विक्षोभों की कुल संख्या में बड़ा परिवर्तन नहीं आया, लेकिन उनकी प्रकृति बदल रही है। कहीं कमजोर विक्षोभों की संख्या बढ़ रही है, तो कहीं अत्यधिक तीव्र घटनाएं कम बार लेकिन अधिक विनाशकारी रूप में सामने आ रही हैं। 

यानी भविष्य में मौसम "सामान्य" कम और "चरम" अधिक हो सकता है।

2026 का मानसून: नई चुनौतियों के संकेत

IMD ने 2026 के लिए मानसून को दीर्घकालिक औसत (LPA) का लगभग 90 प्रतिशत रहने का अनुमान दिया है तथा कम वर्षा की संभावना भी व्यक्त की है। इसका अर्थ यह नहीं कि पूरे देश में कम बारिश होगी। बल्कि कई क्षेत्रों में कम बारिश और कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा की स्थिति एक साथ देखने को मिल सकती है। यह जलवायु परिवर्तन के दौर का नया पैटर्न है। 

मध्यप्रदेश के लिए क्या संकेत?

मध्यप्रदेश देश के मध्य में स्थित होने के कारण मानसूनी ट्रफ, बंगाल की खाड़ी की प्रणालियों, अरब सागर की नमी और कभी-कभी पश्चिमी विक्षोभों के संयुक्त प्रभाव को अनुभव करता है।

भविष्य में प्रदेश में:

अत्यधिक वर्षा वाले छोटे-छोटे एपिसोड,

लंबे शुष्क अंतराल,

गरज-चमक और बिजली गिरने की घटनाएं,

तथा मानसून के वितरण में असमानता

बढ़ सकती है। विशेष रूप से भोपाल, नर्मदापुरम, महाकौशल, बुंदेलखंड और ग्वालियर-चंबल क्षेत्र ऐसे परिवर्तनों के प्रति संवेदनशील रहेंगे।

निष्कर्ष

भारत का मानसून अब केवल समुद्र और हवाओं की कहानी नहीं रह गया है। इसमें आर्कटिक की गर्मी, अरब सागर का तापमान, हिमालय की बदलती जलवायु और पश्चिमी विक्षोभों की नई भूमिका भी शामिल हो चुकी है। जलवायु परिवर्तन ने मौसम प्रणालियों के बीच संबंधों को अधिक जटिल बना दिया है। इसलिए भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती केवल "कितनी बारिश होगी" नहीं, बल्कि "बारिश कब, कहां और कितनी तीव्र होगी" यह होगी।

यही बदलता मौसम विज्ञान आने वाले वर्षों में भारत की कृषि, जल सुरक्षा और आपदा प्रबंधन की दिशा तय करेगा।

शैलेन्द्र कुमार नायक

मौसम एवं पर्यावरण विशेषज्ञ, भोपाल