भोपाल: राज्य सरकार ने सरोगेसी पर नियंत्रण के लिये जिला स्तर पर कमेटियां गठित कर दी हैं। यह कमेटी देखेगी कि सरोगेसी परोपकारी दृष्टि से किया जा रहा है या व्यवसायिक लाभ के लिये।
उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने पिछले साल सरोगेसी (विनियमन) अधिनियम, 2021 लागू किया है। सरोगेसी एक ऐसी विधि है जिसमें कोई महिला संतान के इच्छुक किसी जोड़े के बच्चे को अपने गर्भ में पालती है और जन्म के बाद इसे बच्चे को जोड़े को सौंप देती है। इससे पहले उस जोड़े के शुक्राणु और अंडाणु को प्रयोगशाला में निषेचित किया जाता है और जब यह एक भ्रुण के रूप में आ जाता है तो इसे उस महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है।
सरोगेसी कानून देश में सरोगेसी सेवाओं के नियमन, सरोगेट माताओं के संभावित शोषण पर रोक लगाने और सरोगेसी के माध्यम से पैदा हुए बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने का प्रावधान करता है। यह कानून वाणिज्यिक पैमाने पर सरोगेसी पर रोक लगाता है और केवल परोपकारी सरोगेसी की अनुमति देता है जिसमें सरोगेट मां को गर्भ की अवधि के दौरान चिकित्सा खर्च और बीमा कवरेज के अलावा कोई और वित्तीय मुआवजा नहीं दिया जाता है।
सरोगेसी की अनुमति तब दी जाती है जब संतान के इच्छुक जोड़े को चिकित्सा आधार पर प्रमाणित बांझपन हो। यह परोपकार की दृष्टि से किया गया हो। इसका मकसद वाणिज्यिक नहीं है। बच्चों को बेचने, वेश्यावृति कराने और किसी अन्य प्रकार के शोषण कार्यों के लिए पैदा नहीं किया गया हो। विनियमों के माध्यम से निर्दिष्ट किसी बीमारी या अन्य स्थिति की दशा में।
ऐसी है जिला कमेटी :
राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने सभी जिलों में उक्त कानून के तहत सक्षम एस्सिटेड रिप्रोडक्टिव टेक्नालॉजी एवं सरोगेसी प्राधिकारी का गठन किया है। इसमें पदेन अध्यक्ष जिला कलेक्टर को बनाया गया है जबकि अपर या संयुक्त कलेक्टर पदेन सदस्य रहेंगे और सीएमएचओ सदस्य सचिव रहेंगे।
कमेटी में कलेक्टर द्वारा नामांकित स्त्री एवं प्रसुति रोग विशेषज्ञ/शिशु रोग विशेषज्ञ/रेडियोलॉजिस्ट नामांकित सदस्य होंगे जबकि जिला अभियोजन अधिकारी पदेन सदस्य रहेंगे। यह कमेटी कानून का उल्लंघन कर सरोगेसी कराने वाले पर कार्यवाही भी करेगी।