इस गड़बड़ी को ठीक करने के लिये वन विभाग की वन्य प्राणी शाखा के एपीसीसीएफ शुभरंजन सेन ने क्षेत्रीय टाइगर स्ट्राइक फोर्स के सभी प्रभारी अधिकारियों को पत्र जारी कर कहा है कि विभिन्न अधिरोपित वन अधिनियमों में उल्लेखित/अधिकृत विभिन्न स्तर के वनाअधिकारी में से सबसे वरिष्ठतम स्तर के वनाधिकारी के द्वारा ही प्रकरण का परिवाद न्यायालय में पेश किया जावे, ताकि बचाव पक्ष को इसका फायदा न मिले सके व शासनहित मे प्रकरण का निपटारा समय-सीमा में हो सके।

पत्र में एपीसीसीएफ ने बताया है कि स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स की अधीनस्थ क्षेत्रीय इकाईयों द्वारा संगठित वन्यप्राणी अपराध से संबंधित प्रकरण दर्ज किये जाते हैं। यदाकदा प्रकरण में आई साक्ष्य एवं अपराध कारित की विषयवस्तु के आधार पर अन्य वन अधिनियमों के उल्लंघन की विभिन्न धाराओं को भी अतिरिक्त रूप से अधिरोपित कर प्रकरण की विवेचना की जाती है। विभिन्न वन अधिनियमों में अलग-अलग स्तर के अधिकारी को परिवाद प्रस्तुत करने हेतु अधिकृत किया गया है। इसमें भारतीय वन अधिनियम 1972 में परिक्षेत्र सहायक, मप्र तेन्दूपत्ता व्यापार विनियम 1964 में सहायक वन संरक्षक, मप्र वनोपज व्यापार विनियमन 1969 में सहायक वन संरक्षक, वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 में वन परिक्षेत्र अधिकारी, मप्र काष्ठ चिरान विनियमन 1984 में उपवनमंडलाधिकारी/सहायक वन संरक्षक तथा जैव विविधता अधिनियम 2002 में रेंज ऑफिसर और उससे ऊपर के अधिकारियों को कोर्ट में परिवाद प्रस्तुत करने के लिये अधिकृत किया गया है।

एपीसीसीएफ ने पत्र में कहा है कि यह तथ्य प्रकाश में आया कि सक्षम स्तर के वनाधिकारियों के द्वारा परिवाद प्रस्तुतीकरण नहीं किया गया/जा रहा है। मुख्यत: ऐसे प्रकरणों में जिसमें एक या एक से अधिक अधिनियमों की धाराओं को अधिरोपित कर प्रकरण दर्ज किया गया है। उक्त प्रकरण कमजोर होकर शासनहित में निराकरण किया जाना संभव नहीं होगा। इसलिये विभिन्न अधिरोपित वन अधिनियमों में उल्लेखित/अधिकृत विभिन्न स्तर के वनाअधिकारी में से सबसे वरिष्ठतम स्तर के वनाधिकारी के द्वारा ही प्रकरण का परिवाद न्यायालय में पेश किया जावे, ताकि बचाव पक्ष को इसका फायदा न मिले सके व शासनहित मे प्रकरण का निपटारा समय-सीमा में हो सके। इन निर्देशों का कड़ाई से पालन किया जाये।