इंदौर. उनका बचपन बहुत अच्छा बीत रहा था लेकिन अचानक एक हादसे ने उन्हें बिना हाथों के कर दिया। वे महज 7 साल की उम्र में हाइटेंशन तार के संपर्क में आ गए थे और इस हादसे में उनके दोनों हाथ झुलस गए, सभी हड्डी गल गईं. बाद में उनके दोनों हाथ काट दिए गए पर उन्होंने हौसला नहीं खोया। हादसे के बाद उन्होंने अपनी मां और भाई के बलबूते खुद को हर तरह से आत्मनिर्भर बना लिया। वे अब फुटबॉल खेलते हैं, स्केटिंग करते हैं और अच्छे तैराक भी हैं. इंदौर निवासी विक्रम अग्निहोत्री का ये सफर यहीं नहीं रुका. 2016 में विक्रम भारत के पहले बिना हाथों वाले कार लाइसेंस होल्डर बन गए। इतना ही नहीं, उनका नाम लिम्का बुक रिकॉर्ड में भी दर्ज हो गया है।
विक्रम अग्निहोत्री बताते हैं कि मैं हर वो काम कर लेता हूं जो हाथों से किया जा सकता है। खुद खाना खाता हूं, शेविंग करता हूं, तैरता हूं, यहां तक कि स्केटिंग भी करता हूं। 2015 से तो मैं कार भी चला रहा हूं। कुछ भी ऐसा नहीं है जो मैं खुद नहीं कर सकता। मेरे पुलिस ऑफिसर पिता ने मुझे बहुत मोटिवेट किया. पर मेरी मां और भाई का मेरी जिंदगी में सबसे बड़ा रोल रहा. उन्होंने मुझे बुरी परिस्थिति में ही सेल्फ डिपेंडेंट होना सिखा दिया है।
हादसे से मेरे दोनों हाथ जल गए थे. हड्डियां गल गईं थीं लेकिन मां ने हौसला नहीं हारा और मुझे भी कभी भी निराश नहीं होने दिया. उन्होंने मुझे हर तरह से प्रेरित किया, मेरा कॉन्फिडेंस लेवल बढ़ाया, मेरी स्ट्रेंग्थ बढ़ायी. मेडिकल की भाषा में मैं भले ही 90% डिसेबल हूं लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि 90% कुछ नहीं कर सकता। सभी परिजनों का लक्ष्य था कि मैं आत्मनिर्भर बनूं और उसी का हिस्सा कार ड्राइविंग भी था.”
विक्रम बताते हैं, मुझे कहीं भी जाने के लिए ड्राइवर या अपने फ्रेंड पर निर्भर रहना पडता था. ऐसे में खुद ड्राइवर बनने का विचार कर लिया. मैं ये भी समझ चुका था कि मैनुअल कार तो नहीं चला पाऊंगा, मुझे ऑटोमेटिक कार ही ट्राई करना होगा. सबसे बड़ी समस्या ड्राइविंग लाइसेंस मिलने की थी. इसके लिए मैंने मोटर व्हीकल एक्ट पढ़ा. इस एक्ट में ये पाया कि पैर से कार चलाने पर कोई डिस्क्वालिफिकेशन नहीं है. इसके बाद 2015 में मैंने ऑटोमेटिक कार खरीद ली और एक महीने में कार चलाना सीख भी लिया. फिर लर्निंग लाइसेंस के लिए आरटीओ साहब के पास पहुंचा. मैंने उन्हें कार में बैठाकर खुद घुमाया. इससे वे समझ गए कि मुझे गाड़ी चलानी अच्छी से आती है. उन्होंने मुझे लर्निंग लाइसेंस दे दिया।
इसके बाद परमानेंट लाइसेंस में टेक्निकल प्रॉब्लम आ रही थी लेकिन तभी मेरी मुलाकात केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरीजी से हुई. मैंने उन्हें सब कुछ बता दिया। इसी दौरान सन 2016 में नियमों में अमेंडमेंट हुआ जिसके बाद मुझे पहला लाइसेंस मिला। इसी के साथ ही लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी इसे जगह दी गई।