सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने सोमवार को तलाक को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि अगर पति-पत्नी के रिश्ते टूट चुके हों और सुलह की गुंजाइश ही न बची हो, तो वह भारत के संविधान के आर्टिकल 142 के तहत बिना फैमिली कोर्ट भेजे तलाक को मंजूरी दे सकता है। इसके लिए 6 महीने का इंतजार अनिवार्य नहीं होगा।

जस्टिस एसके कौल, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस एएस ओका और जस्टिस जेके माहेश्वरी की संविधान पीठ का यह फैसला हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत निर्धारित अनिवार्य अवधि की प्रतीक्षा करने के लिए पारिवारिक अदालतों के संदर्भ के बिना सहमति पक्षों के बीच विवाह को भंग करने के लिए शीर्ष अदालत की पूर्ण शक्तियों के उपयोग से संबंधित याचिकाओं के एक बैच में आया है।

पांच जजों की इस पीठ ने 29 सितंबर, 2022 को सुनवाई पूरी करने के बाद इस मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. अपने आदेश को सुरक्षित रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि सामाजिक बदलावों में कुछ समय लग सकता है और नए कानूनों को लागू करना समाज को अपनाने के लिए राजी करने से ज्यादा आसान हो सकता है. बहरहाल इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने भारत में विवाह में परिवारों की महत्वपूर्ण भूमिका को भी स्वीकार किया था.

कोर्ट ने कहा कि उसने वे फैक्टर्स तय किए हैं जिनके आधार पर शादी को सुलह की संभावना से परे माना जा सकेगा। इसके साथ ही कोर्ट यह भी सुनिश्चित करेगा कि पति-पत्नी के बीच बराबरी कैसे रहेगी। इसमें मैंटेनेंस, एलिमनी और बच्चों की कस्टडी शामिल है।