गोस्वामी तुलसीदास कृत रामायण के छंदों और छंदों में रचित काव्य रचना रामचरित मानस को लेकर देश में विपक्षी दल पिछले कुछ दिनों से लगातार विरोध कर रहे हैं। हर दिन रामचरित मानस को लेकर नया विवाद खड़ा हो रहा है। ताज़ा मामला सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य द्वारा रामायण की प्रतियां जलाए जाने का है।

इससे पहले बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने राम चरित मानस का विरोध किया था। 11 जनवरी को नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने 'रामचरित मानस समाज में विवाद पैदा करता है' कहकर माहौल गर्म कर दिया था और इसके बाद सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने एक बार फिर इस विवाद को हवा दे दी है। लखनऊ में ओबीसी महासभा ने स्वामी प्रसाद मौर्य के विवादित बयान के समर्थन में रामचरितमानस की प्रतियां जलाकर विरोध जताया।

कहा जा रहा है, कि यूपी की सियासत और उसके इतिहास में ये पहली बार नहीं है जब यहां रामचरित मानस के पन्ने फाड़े गए हैं। जी हां आज हम आपको ऐसे ही एक और नेता के विषय में बताएंगे, जिन्होंने 48 साल पहले विधान सभा में रामचरित मानस फाड़ कर विरोध जताया था।

उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात की डेरापुर विधानसभा सीट से विधायक रामपाल सिंह यादव ने राम चरित मानस का विरोध किया। रामपाल सिंह यादव समाजवादी पार्टी यानि कि सोशलिसिट पार्टी के विधायक थे, उन्होंने उस समय राम चरित मानस का विरोध किया था, जिसकी कीमत उन्हें अपना राजनीतिक करियर खोकर चुकानी पड़ी थी।

दिवंगत नेता रामपाल सिंह यादव ने 1974 में विधानसभा के अंदर रामचरित मानस का विरोध करते हुए एक पेज फाड़ दिया था। उनके इस कृत्य की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी। वो ये कि उनका राजनीति करियर ही ख़त्म हो गया। इस घटना के बाद से उनके विधानसभा क्षेत्र के लोग उन्हें रामपाल की जगह रामायण फाड़ यादव कहने लगे।

इसके बाद उन्होंने लगातार दो चुनाव लड़े, लेकिन दोनों बार उन्हें मुंह की खानी पड़ी। इस घटना से पहले रामपाल यादव लोगों की नजर में लोकप्रिय नेता थे। यही वजह थी कि वे लगातार दो बार विधानसभा का चुनाव जीते। लेकिन अपने रामायण फाड़ने के कृत्य के बाद वे लोगों की नज़रों से इस तरह से उतर गए कि उनका राजनीतिक करियर ही दांव पर लग गया।

स्वामी प्रसाद मौर्य कभी बसपा के कद्दावर नेता हुआ करते थे, लेकिन बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्होंने वह कद खो दिया। इसके बाद वे समाजवादी पार्टी से अपनी सीट भी नहीं बचा सके और अब रामचरित मानस का विरोध करने के बाद उनका हाल भी रामपाल सिंह यादव जैसा होता दिख रहा है। देखना यह है रामपाल सिंह यादव की तरह क्या रामचरित मानस का विरोध अब स्वामी प्रसाद मौर्य का राजनीतिक करियर भी ख़त्म कर देगा?