भोपाल: वित्तीय वर्ष 22-23 में वन क्षेत्रों में फेंसिंग के लिए अब सीमेंट पोल की खरीदी नहीं होगी. फेंसिंग कार्य के लिए बांस और लकड़ी की बल्ली का उपयोग किया जाएगा. विभाग के नए फैसले से फील्ड से सवाल उठने लगे हैं कि बांस लकड़ी की बिल्ली में आग और दीमक लगने का डर है.

प्रदेश में वन क्षेत्रों की फेंसिंग कराने के लिए प्रति वर्ष में करीब 7 से 8 लाख आरसीसी पोल खरीदी होती है. प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख ने सभी सीसीएफ एवं नेशनल पार्क एवं सेंचुरियों के फील्ड डायरेक्टर को पत्र लिखकर निर्देशित किया है कि वन क्षेत्रों में किए जाने वाले कार्य हेतु क्षेत्र के घेराव के लिए लकड़ी अथवा बांस के उपचारित खंबो का ही उपयोग किया जाना सुनिश्चित करें.

साथ ही यह भी निर्देश दिया है कि आरसीसी पोल अथवा अन्य पोल की आवश्यकता हो तो इस कार्यालय से अनुमति प्राप्त करें. जंगल महकमे के मैदानी अमले में वन बल प्रमुख के निर्देश की मिली-जुली प्रतिक्रिया सुनाई दे रही है. फील्ड के अधिकांश अफसर उस निर्णय का स्वागत करते हुए सवाल खड़े कर रहे हैं कि प्रदेश में बांस के ट्रीटमेंट प्लांट इक्का-दुक्का है. ऐसे में बिना ट्रीटमेंट के बांस बल्ली लगाई जाती है तो दीमक लगने का खतरा होगा. इसी प्रकार यूकेलिप्टस की बलि पर भी सवाल उठ रहे हैं कि जंगल से सटे गांव के लोग ही बल्ली उखाड़ ले जाएंगे. इसके अलावा आग लगने का भी भय बना रहेगा. सागर वन मंडल में बांस बल्ली से फेंसिंग की गई थी. गांव के ही भैंस चराने वाले बांस बल्ली उखाड़ के ले गए.

नए निर्णय से होगा 5 से 6 करोड की बचत-

आरसीसी पोल प्रदाय कर्ता फर्म से जुड़े डायरेक्टरों का कहना है कि प्रति आरसीसी पोल की कीमत ₹250 है. हर साल 1 क्षेत्रों की फेंसिंग के लिए 16 से 17 करोड़ रुपए खर्च कर आरआरसी पोल खरीदे जाते हैं. नए फरमान के साथ बांस मिशन के डायरेक्टर यूके सुबुद्धि ने प्रति बांस-बल्ली की कीमत ₹105 तय कर दी है. लंबे समय से प्रदाय करने वाले फर्म के डायरेक्टरों का कहना है कि बांस बल्ली 135 से ₹140 के बीच सप्लाई होगी. जबकि 6 फीट फीट की यूकेलिप्टस की बल्ली की बाजार की कीमत 140 से 150 रुपए प्रति बल्ली है. इसके बावजूद भी नए फरमान पर काम हुए तो वन विभाग इस वित्तीय वर्ष में पांच से छह करोड़ रूपये की बचत कर सकेगा.

सुबुद्धि के दावे पर उठते सवाल-

सुबुद्धि यह दावा करते हैं कि तीन- साढ़े लाख बांस बल्ली प्रदाय करने की तैयारी कर ली है. इतनी बड़ी संख्या में बांस बल्ली कहां से लाएंगे? इस सवाल का जवाब भी हुए एक सर्वे के आधार पर बताते हैं कि 2015-16 में नोएडा की एक कंपनी ने सर्वे किया था. कंपनी ने दावा किया था कि मप्र में एक साल बांस का उत्पादन तीन लाख से अधिक होता है. यानी बांस मिशन के डायरेक्टर ग्राउंड रियलिटी इससे बेखबर है.

जबकि हकीकत यह है कि मप्र में बालाघाट, मंडला, बैतूल, सिवनी और शहडोल बांस का उत्पादन होता है किंतु मांग के अनुसार बांस का उत्पादन नहीं हो रहा है. हरदा वन मंडल मैं एकमात्र ट्रीटमेंट प्लांट है. बाजू पर ट्रीटमेंट प्लांट और भी लगे हैं किंतु वह बंद पड़े हैं. ऐसी स्थिति में पास का आयात असम के किए बिना तीन-साढे तीन लाख बांस बल्ली तैयार करना मुमकिन नहीं है. सूत्रों ने बताया कि प्रमुख सचिव अशोक वर्णवाल बालाघाट और हरदा समितियों के बांस व्यापार बढ़ाने के लिए बांस बल्ली की खपत कराने पर जोर दे रहे हैं.